Wednesday, 18 March 2015

शिक्षक,शिक्षार्थी और शिक्षा का सामाजिक आयाम : डा. शीशपाल हरडू

शिक्षक,शिक्षार्थी और शिक्षा का सामाजिक आयाम : डा. शीशपाल हरडू

शिक्षा का ओपचारिक अर्थ : शिक्षा व्यक्ति की आंतरिक शक्तियों को बाहर लाने या विकसित करने की क्रिया से लिया जाता है I इसी अर्थ को स्वामी विवेकानंद ने मानते हुए कहा कि “मनुष्य में अंतर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्त करना ही शिक्षा है I इस अर्थ के अनुसार शिक्षा व्यक्ति को शिक्षित करती है ,पथ प्रदर्शन करती है , परिस्थतियों से लड़ना सिखाती है और बुराइयों व समस्याओं के समाधान में सक्षम बनती है I शिक्षा का अर्थ शिक्षित या साक्षर होना मात्र नहीं है, बल्कि जीवन जीने की संपूर्ण कला है। विद्यालय से प्राप्त शिक्षा को जीवन में प्रयोग करना सही शिक्षा है। वह साधन हॆ जो समाज को केवल शिक्षित ही नहीं करती वरन व्यक्ति के आत्मीय विकास में भी अहम योगदान निभाती हॆ I शिक्षा हमारी समृद्धि में आभूषण , विपत्ति में शरण-स्थल और जीवन में आन्नद होती है डा. राधा कृष्णन सर्वपल्ली मनुष्य को सही अर्थों में मनुष्य बनाने के लिए शिक्षा को ही सर्वाधिक आवश्यक मानते हुए कहा की “शिक्षा वह है जो मनुष्य को ज्ञान प्रदान करने के साथ-साथ उसके हृदय व आत्मा का विकास करती है “ अत: नैतिक तथा बौद्धिक दोनों ही प्रकार की शिक्षा को शामिल किया गया है I शिक्षा ऐसी हो जो जो चरित्र निर्माण कर सके,बुद्धि को विकास दे, व्यक्ति स्वावलंबी बन सके, स्वार्थपरक सोच को मिटा कर सहयोग को बढ़ा सके I शिक्षा अज्ञान को मिटा कर ज्ञान की ज्योति जलाती है ,उन्नति के मार्ग पर ले जाती है और सभ्य एवं सुसंस्कृत समाज का निर्माण करती है I शिक्षा ही जीवन का वह पहलू है जो मनुष्य को इन्सान बनती है और हमें तमाम उम्र अनुशासित, संयमित और प्रगतिशील बनाये रखती है Iइसी से हमें मनन,चिंतन,चेतना, शक्ति, सद्बुद्धि, विवेकशीलता , विचारशीलता और ज्ञान रूपी शक्ति मिलती है
शिक्षा का व्यवहारिक दृष्टि में अर्थ  : वास्तव में  हम जो ओपचारिक शिक्षा ले रहे है सिर्फ वही शिक्षा है या जो हम घर में, समाज में देखकर,सुन समझकर अनुभव से सीखते है वह भी शिक्षा हैI यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ओपचारिक शिक्षा से हम अक्षर ज्ञान सीखते है जबकि अनुभव हमें जीवन जीने की व्यवहारिक सिखाता है I जब बच्चा जन्म लेता है तो उसके पास प्राकृतिक ज्ञान यानि विवेक होता है जो अन्य जीवों के पास नहीं होता, इसी विवेकरूपी ज्ञान से जन्म के बाद प्रतिदिन कुछ नया सीखता है और इस क्रम में सबसे पहले उस शरीरिक ज्ञान जैसे शोच, भूख, प्यास, नींद, दर्द इत्यादि का पता चलता है फिर उसे भावनात्मक ज्ञान यानि स्नेह, रिश्ते, स्पर्श आदि से अवगत होता है ,इसके बाद सामाजिक ज्ञान यानि ओपचारिक शिक्षा, परम्परा, रीती-रिवाज सीखता है और अगला चरण स्वयं से साक्षात्कार यांनी अध्यात्मिक ज्ञान सीखता हैI इस प्रकार हम बचपन से लेकर अंत तक हर स्तर पर कुछ न कुछ नया सीखते है वह सब शिक्षा ही है I
शिक्षक और शिक्षार्थी और शिक्षा : शिक्षा देने वाला शिक्षक और शिक्षा ग्रहण करने वाला शिक्षार्थी और इनका सम्बन्ध होता है शिक्षा से I वास्तविक रुप में शिक्षा का आशय है ज्ञान, ज्ञान की आकांक्षा रखने वाला होता है शिक्षार्थी ओर इसे उपलब्ध करवाने वाला होता है शिक्षक I पुरातन काल में शिक्षा प्रदान कराते थे गुरू और आज शिक्षक I गुरू ज्ञान प्रदान कराते है और शिक्षक अतीत से प्राप्त सुचना या जानकारी को शिक्षार्थी तक पहुंचता है I सुचना अतीत से मिलती है जबकि ज्ञान अन्दर से प्रस्फुटित होता है I आज का शिक्षक और शिक्षार्थी शिक्षा के माध्यम से केवल सुचना का ही विनिमय कर रहे है ज्ञान का नहीं I पूर्व काल में शिक्षा का क्षेत्र व्यापक था परन्तु शिक्षा पर अधिकार सिमित यानि चुनिन्दा जातियां और कुल के बच्चो तक ही सिमित मगर आज शिक्षा का अधिकार तो सबके लिए व्यापक बना दिया परन्तु क्षेत्र सिमित कर लिया I
आज शिक्षा जीवन नहीं बल्कि जीवन का एक अंग मात्र रह गई है ,वह अंग जो जीवनयापन का माध्यम बन गई है और आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति का जरिया I आज शिक्षा को एक वस्तु बना कर निजी संस्थाओं के माध्यम से महंगे मूल्य पर शिक्षार्थियों को उपलब्ध करवाई जा रही है जिसके चलते शिक्षकों के प्रति जो समर्पण भाव में कमी आई I शिक्षा विषय पूर्णतया आत्मीय सम्बन्धों पर निर्भर करता है और आदर्श उसका आधार होता है, मगर आज शिक्षा व्यापार बन कर प्रचारित व प्रसारित हो रही है I बाज़ारवाद की संस्कृति में शिक्षक एक कर्मचारी और शिक्षार्थी  एक ग्राहक की भूमिका में आ रहा है और उपाधि जनक शिक्षा बेचीं जा रही है न की मानवीय और व्यवहारिक शिक्षा I
आवश्यकता : आदर्श शिक्षक अपने शिक्षार्थी को आत्मीय दृष्टि से इतना परिपक्व बना देता है की उसे यह क्या सीखना है , क्या पढना है और किन बातों से दुरी रखनी है का भलीभांति निर्णय कर सकता है I इस उत्तरदायित्व का निर्वहन प्रत्येक शिक्षक को करना चाहिए तभी समाज में आपका एक आदर्श के रूप में सम्मान होगा I आज आवश्यकता है कि शिक्षक कबीर का वह कुम्हार बने और अपने शिष्य रूपी कुम्भ को एक आदर्श आकर दें और एक सुंदर व स्वस्थ समाज का निर्माण करने में सहयोग करें I इस दुनियां में केवल तीन प्राणी माँ, बाप और शिक्षक ही आपकी उन्नति की कामना नि:स्वार्थभाव  से करते है अत: इनका मान-सम्मान व आदर और सेवा होनी चाहिए, जो इनका तिरस्कार व अपमान करता है वह कभी भी सफल नहीं हो सकता I  शिक्षार्थी  को भी शिक्षा स्वच्छ व निर्मल साधनों से  विशुद्ध परम्पराओं का आदर करते हुए ग्रहण करनी चाहिय्र, अनैतिक और मूल्य-विहीन साधनों का तिरस्कार करना चाहिए I विद्यार्थी को ऐसे कार्यों से बचना चाहिए जो मूल्यों, विचारों व आदर्शों के विरुद्ध हो I जिस कार्य को करते हुए आपको डर लगे तो वो कार्य गलत है उससे दूर रहे और जिस कार्य को करते हुए आपको भय न लगे ,वह कार्य उचित है और उसे पुरी तन्मयता व लग्न से करें I शिक्षक को शिक्षण संस्था के अन्दर शिक्षार्थियों का और संस्थान के बाहर समाज का मार्गदर्शक बनना होता है और सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक  शिक्षा व सोच से शिक्षार्थी व समाज का विकास संभव बनता है I
सही मायनो  में शिक्षा वह है जो विद्यार्थी को किताबी ज्ञान के अतिरिक्त कुछ नया करने,सोचने ,समझने के लिए प्रेरित कर सके, जाति,धर्म के भेद से दूर करे, भाईचारा व सोहार्द बढाये, महिलाओं के प्रति सम्मान बढाये, निर्धन,बेसहारा व कमजोर के प्रति सहानुभूति व सहयोग की भावना पैदा करे, चरित्र निर्माण हो, मनोशक्ति व बुद्धि का विस्तार हो, निरक्षरता,भ्रष्टाचार,गरीबी,भुखमरी के उन्मूलन की चिन्ता हो I शिक्षा केवल धन अर्जन का साधन न होकर देश सेवा के लिए योग्य,कर्मठ, मानवीय गुणों से परिपूर्ण आदर्श व सभ्य नागरिक बनाने वाली होनी चाहिए I

06/03/2015

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