Sunday, 8 February 2015

जननी को जनमने दो, जन्मी को जीने दो

जननी को जनमने दो, जन्मी को जीने दो
डा.शीशपाल हरडू
हमारा देश, समाज और हम लगातार प्रगति कर रहे है मगर इस उन्नति की डगर में एक काला दाग भी लगा रहे है हम I आज हम अपनी ही बेटियों को माँ का मुंह नहीं देखने दे रहे, उन्हें ज़िन्दगी का पहला साँस भी नहीं लेने दे रहे और उसे कोख़ में ही क़त्ल कर रहे है तथा महापाप व कुकृत्य के भागीदार तो बन ही रहे है, समाज में अराजकता, अपराध और असंतुलन को भी बढ़ावा दे रहे है I समाज में ये दो मान्यताये एस कुकृत्य को बढ़ावा दे रही है की बेटा बुढ़ापे का सहारा होता है अगर ऐसा होता तो आज इतने वृद्धाश्रम क्यूँ खुल रहे है दूसरा की बेटा कुल का नाम चलता है जबकि आज की भौतिकवादिता की दौड़ में युवा देश विदेश में नोकरी व्यवसाय कर रहे है जहाँ कुल गोत्र की पहचान न होकर स्वयं की और उसके काम की होती है I बेटा तो एक घर का दीपक होता है जबकि बेटी दो घरों को अपना बना कर अपने गुणों व संस्कारों से महकती है ,चमकती है फिर भी जाने क्यूँ माँ बाप अपनी निर्दोष बेटी के खून से रंगी रोटी खा कर अमानवीय कृत्य कर रहे है I
हम बचपन से पढ़ते और सुनते आए है की माँ और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर होती है,आज हम यही बात भूल कर अपनी माँ और मातृभूमि दोनों का अपमान कर रहे है I जिसने हमें जन्म दिया और जिसकी वजह से हम इस दुनिया में आये है उसी स्त्री का जन्म से पहले ही क़त्ल कर देना पाप ही नहीं एक घिनौना कुकृत्य व दानवीय आचरण हैI  प्रकृति ने केवल नारी को ही ये क्षमता, गुण और शारीरिक बनावट दी है, हमारा जन्म नारी के बिना सम्भव नहीं तो फिर नारी का ही इतना अपमान क्यूँ ?  क्यों नहीं आने दे रहे इसे इस दुनियां में ? हमें माँ, बहन, पत्नी,  सब प्यारी लगती है तो फिर बेटी क्यों नहीं ? बेटी ही तो कल समाज में माँ, बहन और पत्नी की की भूमिका निभायेगी I एकबारगी हम मान भी ले की आपको बेटी नहीं , बीटा चाहिए तो कल आप अपने बेटे के लिए बहु कहाँ से लाओगे, आखिर बात फिर वहीँ आकर ठहरती है की अगर लड़की नहीं होगी तो संसार कैसे चलेगा I हम सब इस हकीकत को जानते हुए भी निर्दयी बन कर अपने की खून का क़त्ल करने को हो जाते है , आखिर समाज किस और जा रहा है, हमारी मानवीयता और नैतिकता कहाँ मर गई ? हम क्यों अपनी अजन्मी बेटी को बिना किसी कसूर के मार रहे है ,आपकी संवेदना व ममता कहाँ चली जाती है ? आज बेटी मरी जा रही है जिसका कोई गुनाह नहीं और हम गुनाह करके भी जिन्दा है ? इस बात पर विचार केवल हम माँ बाप ही कर सकते है कोई दूसरा नहीं I
हम सब जानते है की हमारी जिन्दी में बेटियों का क्या महत्व है, हम यह भी समझते है कि बेटी के बिना सृष्टि का कोई अस्तित्व नहीं I फिर भी सामाजिक कुरीतियों, विकृत मानसिकता, दानवी दहेज़ और घर से बहार असुरक्षा ने इस भेदभाव व  अपराध को और मजबूती दी और बेटियां बोझ लगाने लगी I जब समाज में बेटी असुरक्षित होगो तो फिर कौन और क्यूँ चाहेगा बेटी? जिस प्रकार प्रकृति ने बेटी को विशेष बनाकर इस सृष्टि में भेजा है और हमारी संस्कृति ने इसे विशेष दायित्व दिए है उसी प्रकार हमें भी बेटी को विशेष शिक्षा,विशेष सुरक्षा, विशेष वातावरण और विशेष स्वास्थ्य व्यवस्था  का निर्माण करना होगा तथा हमारी सोच को सकारात्मक बनाना होगा तभी इस गंभीर मर्ज़ का इलाज संभव है I कहते है की भगवान बेटी उसी को देता है जिसकी बेटी पालने की हेसियत हो तो हम सबको आदर्श समाज की स्थापना करने हेतु हेसियातवान बनना होगा और  इस कलंक को मिटा कर संसार की सबसे सुंदर कृति  को अपने आँगन में सहर्ष खेलने देना होगा, तभी जननी जन्मेगी ही और जन्मी बेटी जी भी पायेगी I हमें ऐसा परिवेश, वातावरण और विश्वास कायम करना होगा की बेटीया घर की दहलीज़ से लेकर आसमान तक सुरक्षित रहे और पुरुष अपने पुरुषार्थ का सम्मान करते हुए नारी रक्षा व सुरक्षा को अपनी सोच में स्थान दे, बेटियों का सम्मान करे और बेटी जन्म पर अभिमान करे तभी इस सामाजिक कालिख को साफ कर पाएंगे और बेटी को अपना अधिकार भी दे पाएंगे I आओ हम सब अपना दृष्टिकोण बदले और समाज के क़र्ज़ को चुकता करे, बेटी जन्म को देवी अवतार या पर्व के रूप में मनाये तथा नारी की रक्षा, सुरक्षा को अपना कर्तव्य समझते हुए समाज में संतुलन, समानता और स्वस्थता प्रदान करें I   

08/02/15   

1 comment:

  1. सामाजिक बुराई के विषय पर गंभीर चर्चा ,शायद लोगो की नींद टूटे

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