सामान्यत: लोग समृद्धि का अर्थ आर्थिक सम्पनता से
से लगाते है और ऐसा सोचना इस भौतिकवादी युग में स्वाभाविक भी है परन्तु आज
पाश्चात्य रहन-सहन. खानपान और सोच से समाज इतना प्रभावित हो रहा है की अपनी विरासत
और परम्परा को हम खोये जा रहे है I हम प्रदूषणयुक्त वातावरण में जीने को तो मजबूर
है ही, संयुक्त परिवार को छोड़ कर एकल जीवन को अपना कर भावी पीढ़ी को अवसाद व अराजक
परिवेश उपलब्ध करवा रहे है I आज हमारा युवा दिशाहीन, उद्देश्यविहीन होकर उद्दंड व नकारात्मक
गतिविधियों में संलग्न होकर अपना भविष्य, स्वास्थ्य ,आचरण व चरित्र बिगाड़ रहा है, सोच छोटी कर रहा है और विचार
दूषित कर रहा है I आज धन की अंध दौड़ में हम अपने संस्कार छोड़ रहे है , बड़े-बुजुर्गों
का आदर सत्कार नहीं हो रहा है, मूल्यों को दांव पर लगा रहे है , युवा पाश्चात्य जीवनशेली
अपना रहा है I
आज हमें
भौतिक समृद्धि की बजाय हमारे नोजवानों को स्वास्थ्य से, चरित्र से, विचारों से
,संस्कारों से,शिक्षा से और सोच से समृद्ध बनना होगा I अगर हम स्वस्थ है तो
परिश्रम से धन अर्जित कर सकते है , चरित्र व शिक्षा से समृद्द है तो धन अर्जित
करना सुलभ हो जायेगा, विचारों व सोच में सकारात्मकता धन अर्जित करने के नये रास्ते
उपलब्ध करवाएगा और संस्कारों से समृद्धि धन अर्जन को स्थायी बना देगा I एक कहावत
की अगर आपका धन खो गया तो कुछ नहीं खोया, स्वास्थ्य खो गया तो कुछ खोया और अगर
चरित्र खो गया तो सब कुछ खो गया I आज समाज में चरित्र सबसे दुर्लभ और कमजोर पक्ष
है, विश्वास ख़त्म होता जा रहा है, समाज में भष्टाचार व दुराचार चरम पर है, विचार व
संस्कार मर रहे है, स्वास्थ्य नशे की मार झेल रहा है और शिक्षा मूल्यहीन व बिकाऊ
बनती जा रही है I
ऐसे में आज जरुरत है अपने युवा साथियों को
सकारात्मक व गतिशील वातावरण देते हुए उन्हें आर्थिक समृद्धि के साथ साथ स्वास्थ्य,
चरित्र, विचार, संस्कार, शिक्षा और सोच से
समृद्द बनना होगा ताकि समाज को उन्नति व प्रगति के मार्ग को स्थायी स्वरूप मिल सके
और हमारे नोजवान साथी अपना कल पूर्णतया सुरक्षित बना सके , समाज का हर तबका शांति,
सदभाव, प्रेम व सहकार से जीवन जी सकें और समृद्ध समाज का निर्माण हो सकें I
14/02/15
No comments:
Post a Comment