Tuesday, 24 February 2015

सफलता का रहस्य –डा. शीशपाल हरडू


सफलता या असफलता यह सिद्ध करती है की आपके प्रयास पुरे मनोयोग से किया गया है या नहीं क्योंकि सफलता संकल्प से मिलती है ,सफलता का मूल सूत्र है आत्मविश्वास व सहजता के साथ अनुशासन में रहकर लक्ष्य व मंज़िल तक पहुंचना I आत्मविश्वास उस दूरदर्शी शक्ति का नाम है जो हमारे नेक इरादे, सही सोच, अटल संकल्प, अदम्य साहस, सहनशीलता और अनुशासन से मिलती है जिसका अर्थ स्वयं पर प्रबल आस्था, निष्ठा और विश्वास से है I आत्मविश्वास आत्मबल से आता है और आत्मबल सहजता, कर्म, कामना, विश्वास, सक्रियता, और धेर्य से बढ़ता है I सफलता भाग्य व भविष्य के भरोसे बैठे रहने से नहीं मिलती बल्कि अपने आलस्य, सुख-सुविधा व आराम का त्याग, समर्पण व बलिदान करते हुए अपने कर्म व कामना अनुरूप प्रयास करने से मिलती है I हर व्यक्ति अपने जीवन में सफल होना चाहता है लेकिन सफलता ख्याली पुलाव पकाने वाले, शेखचिल्लियाँ बघारने वाले और कोरी कल्पनाओं में सोए रहकर सपने देखने वालो को नहीं मिलती बल्कि सफलता ब्याज चाहती है  यानि मेहनत, लग्न, क्रियाशीलता और त्याग रूपी क़ीमत लगाकर पानी होती है I कहते है की मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप होता है और जीवन में कामयाबी हासिल अपने इरादों से, जज्बे से और लग्न से करता है I
 विभिन्न विचारकों, दार्शनिकों और विद्धवानों ने अपने अनुभव व अनुसंधान से मनुष्य को जीवन में सफल होने के लिए दृढ़ इच्छा व संकल्प शक्ति को अपने अन्दर विकसित करते हुए मन, बुद्धि व शरीर से इच्छित लक्ष्य को पाने के लिए किसी भी हद तक परिश्रम करने को तैयार होना होगा ,इसके लिए उचित योजनाबद्ध व धेर्यपूर्वक कार्य  को करते हुए विपरीत परिस्थिति के समाधान की व्युरचना बनानी होगो I संकल्प छोटे परन्तु स्थायी ले तभी शक्ति का विकास होगा I सफलता का दूसरा पायदान परिश्रम व पुरुषार्थ है और मनुष्य को अपने लक्ष्य के अनुरूप श्रम करना होगा,अपनी शक्ति का समुचित उपयोग करना होगा तथा कामचोरी व आलस्य का त्याग करना होगा I हमे हाय याद रखना चाहिए की सफलता अपनी कीमत जरुर मांगती है और इसकी क़ीमत उसका पसीना होती है I सफलता के लिए आत्मविश्वास , आत्म निर्भरता , स्वावलम्बी और निरंतर प्रयास के गुण विकसित करने के साथ साथ नकारात्मक सोच का त्याग भी करना होगा क्योंकि नकारत्मक सोच व्यक्ति में निराशा, भय, संदेह, अविश्वास और घुटन पैदा करती है और शक्ति को क्षीण करते हुए कार्यक्षमता को नष्ट कर देती है I अतीत की असफलताओं व गलतियों की चिन्ता न करके सबक लें और भविष्य के लिए योजनाबद्ध संकल्प के साथ मजबूत शुरुआत दे क्योकि अच्छी शुरुआत सफलता का आधार होती है I  व्यस्त रहें, मस्त रहें और आवश्यकताएं कम रखते हुए परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तन लाते हुए मंज़िल की और बढे , सफलता आपका राह देख रही होगी I सदा प्रसन्न रहते हुए, नम्र स्वभाव रखते हुए सफल और महापुरुषों को आदर्श मानें ,  कुसंग व व्यसन से बचे ,श्रेष्ठ आचरण रखे, हिंसा व व्यभिचार से दूर रहे, अभद्र भाषा का प्रयोग न करे, कपट व आलस्य का त्याग करें, धन व समय का अपव्यय व दुरूपयोग न करें,क्रोध और अहंकार से बचे, विनम्र व शालीन बने तो आपको हर कदम पर सफलता ही मिलेगी I
अत: विद्यार्थियों और युवा साथियों, आप अपना व्यवहार सोम्य,शिष्ट और सहयोग पूर्ण रखे, माता-पिता,गुरू, मित्र, व बड़ों का सहयोग व आशीर्वाद ले , समय का सही प्रबंध व सदुपयोग करें ,संयम बरतें, प्राथमिकतातय व दिनचर्या करे और अपने कार्य की समीक्षा करते हुए आगे बढे तो हर अवसर आपके हाथ में रहेगा तथा सफलता आपकी मोहताज़ बन कर सदा आपके पास रहेगी I इसलिए उठिए, जागिये और आज अभी से ही अपनी वांछित सफलता को पाने के लिए जुट जाइये I
25/02/2015


सफलता का रहस्य सकारात्मक विचार शक्ति –डा. शीशपाल हरडू


दोस्तों, अगर हम जीवन में सफल होना चाहते है तो इसका एक मात्र सूत्र है की आप सकारात्मक सोच रखें, सकारात्मक संवाद करें, सकारात्मक आचरण रखें और सकारात्मक कार्यों को जीवन में शामिल करें I नकारात्मक व निराशाजनक सोच, संवाद, आचरण और कार्य मनुष्य को अवसाद में ले जाता है और असफलता को प्राप्त हो जाता है क्योंकि हम क्या सोचते है इस बात का हमारे जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव रहता है I हमारे सकारात्मक विचार ही मन में उपजे निराशा के भावों को दूर करते हुए आशा व उम्मीद के मार्ग दिखलाता है I स्वामी विवेकानंद का कथन “ हम वो है जो हमारी सोच ने हमें बनाया है इस लिए इस बात का ध्यान रखिये कि आप क्या सोचते है “ बहुत ही सार्थक है I हम विपरीत परिस्थितियों में सकारात्मक व आशावादी सोच के बल पर अंधकार को प्रकाश में, मुश्किल को सरलता में और हार को जीत में बदल सकते है I  यदि हम एक मुश्किल से घबरा कर अपनी लय बिगाड़ लेंगे, एक असफलता से मैदान छोड़ देंगे तो न केवल हम जीत से दूर हो रहे होते है अवसाद और मानसिक बीमारी को भी निमन्त्रण दे रहे होते है I हर असफलता, मुश्किल और परेशानी हमारी परीक्षा लेने आती है और हमारी जीत की चमक बढ़ाने के लिए आती है I प्रयत्न व परिश्रम से पाई सफलता का मूल्य कई गुना ज्यादा होता है दान में मिली सफलता के मुकाबले I हमे हमेशा महान व ऊँचे विचारों से परिपूर्ण रहना होगा तभी हम हर कठिन से कठिन कार्य कर सकेंगे I यदि हम सोचे कि मै उर्जावान हूँ , आज सबसे अच्छा है , मैं केवल यही नहीं हर कार्य कर सकता हूँ ,कोई विषम या प्रतिकूल हालात भी मुझे विचलित नहीं कर सकती तो समझो हम हर कार्य संम्पादित कर सकते है क्योंकि सकारात्मक विचार शैली हर परिस्थिति में हमारा मनोबल ऊँचा रखती है I
सकारात्मक व्यक्ति दूसरों में भी सकारात्मक उर्जा का संचार करता है I सामान्यत: लोग काम की अधिकता को देख कर या काम से बचने के लिए यह कहने लग जाते है की उक्त का हम से नहीं होगा, यहीं से हमारे में नकारात्मक विचार आने शुरू हो जाते है जो कुंठा बन हमारी सफलता का मार्ग अवरुद्ध करते है I यदि हम ना की जगह यह कहें की हम कोशिश करते है , ये कर सकते है तो ये हमारी सकारात्मक सन्देश सफलता का वातावरण बनता है I हमें अपने नकारात्मक विचारों से दूर रहना चाहिए अन्यथा हे नकारात्मक विचार हमारी सफलता की सम्भावना को ही नष्ट कर देगा I हमारे विचार उस रंगीन चश्में की तरह होते है जिसे पहन कर हर वस्तु उसी रंग की दिखाई देती है जिस रंग का हमने चश्मा पहना है अत: यदि हम सकारात्मक रंग का चश्मा पहनेंगे तो सब कुछ संम्भव नज़र आएगा I यदि हम अपने सपनों और लक्ष्यों को सकारात्मक विचारों से सिंचेगे तो सफलता की फसल अवश्य पनपेगी इसलिए हमें केवल सकारात्मक विचारों को ही अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाना चाहिए और नकारात्मकता को पास भी नहीं फटकने देना चाहिए तभी सफलता हमारा इंतजार करेगी I
स्वामी विवेकानंद जी के कथनानुसार “ मन में अच्छे विचार लाये ,उसी विचार को अपने जीवन का लक्ष्य बनाये ; हमेशा उसी के बारे में सोचे , उसी के सपने देंखे  और उसी के लिए हर क्षण जिए तो आप पाएंगे कि सफलता आपके कदम चूमेंगी “ इसलिए भाइयों यदि हम यह सोचें की हम कुछ भी कर सकते है , कुछ  भी करने में सक्षम है और कुछ भी करने की हिम्मत है तो यही सोच आपके हर सपने को सच बनाएगी और जो भी सम्भावना इस अनन्त ब्रह्मांड में हे वो सारी आपकी हो सकती है I तो आइये सकारात्मक विचारों को अपने जीव में अपनाये और सार्थक व सफल जीवन बनाये I

24/03/2015

Thursday, 19 February 2015

नशा छोड़ो घर जोड़ो – डा. शीशपाल हरडू


दोस्तों हमारे समाज में सामाजिक समारोह में मेहमानों की मनुहार के नाम पर नशा परोसने की जो सामाजिक बुराई व्याप्त है उस से न केवल आर्थिक नुकशान उठाना पड़ता है बल्कि युवा लोगों को नशे की और धकेलने का भी काम करते है I जो खर्च हम अपने बच्चों के भविष्य को सजाने संवारने में, उनकी शिक्षा व सुरक्षा पर करना था वो हम नशे पर कर रहे है और इस सब का परिणाम घर परिवार के नाश के रूप में मिलता है I बच्चों के भविष्य का पैसा नशे में उड़ाने वाला अपने परिवार का अपराधी तो होता ही है , उनके स्वास्थ्य बिगाड़ने का गुनाह भी कर रहा होता है I क्या आपने नशा खरीदते वक्त कभी सोचा है की आप अपने माता-पिता की गाढ़ी कमाई से मौत को तो नहीं खरीद रहे है ? क्या आप इस नशे के लिए ही कमा रहे हो ? यदि इस नशे से आप बेवक्त मर गए तो आपके माता-पिता, पत्नी और बच्चों का क्या होगा? इस नशे की वजह से आपके परिवार को किन किन मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है ? और हम है की परम्परा के नाम पर मूंछ को ऊँचा रखने की खातिर परिवार की खुशियां कुर्बान कर रहे है और अपने लिए मौत को आमन्त्रण दे रहे है I
आज हमारे युवा नशे के शिकार हो रहे है, जो कल के देश के जाबांज कर्णधार है व्ही आज सबसे ज्यादा नशे का शिकार है, जिन्होंने परिवार,समाज और देश की उन्नति व सुरक्षा में अपनी उर्जा लगानी थी वे ही आज अपनी अनमोल शरीरिक और मानसिक उर्जा नशे व नशे की पूर्ति हेतु चोरी, डकेती और अन्य अपराध में शामिल होकर सामाजिक कुरीतियों में नष्ट कर रहे है I आज ज्यादातर युवा नशे का शिकार हो रहा है जिसकी वजह से हमारी युवा शक्ति क्षीण हो रही है और हम युवाविहीन हो रहे है I नशा केवल आर्थिक कमजोरी ही नहीं देता बल्कि स्वास्थ्य को खत्म करके विभिन्न रोगों को भी आमन्त्रण देता है और अपराधों को जन्म देता है I इस सब मौत के खेल के लिए जिम्मेदार हम खुद है जो कभी शौंक, कभी परम्परा, कभी शान तो कभी स्वार्थ में इतने अंधे हो जाते है की हमें ये ध्यान ही नहीं रहता की हम क्या कर रहे है और हमारे बच्चे कैसा व्यवहार कर रहे है और आज चकाचौंध भरी भौतिक दौड़ में हम अपना भविष्य दांव पर लगा रहे है I
इसलिए आज हमें समाज की इस बड़ी बुराई को दूर करने के लिए सबसे पहले हमें जागरूक होना होगा और इस नशे की बीमारी को अपने अन्दर से बाहर निकल फेंकना होगा नहीं तो यह कुरीति धीरे धीरे एक दिन हमें हमारे समाज को और हमारे देश को निगल जाएगी और हमारा व हमारे युवा साथियों का अस्तित्व बचना मुश्किल हो जायेगा Iअत: आओ हम सब मिलकर नशा मुक्त परिवार , नशा मुक्त समाज और नशा मुक्त भारत का निर्माण करें  और अपना कल सुंदर व सुरक्षित बनाये I
आओ नशा छोड़े घर जोड़े I
19/02/2015



Wednesday, 18 February 2015

जाट समाज में व्याप्त सामाजिक बुराइयाँ और युवा की भूमिका- डा.शीशपाल हरडू


आज का युग प्रतिस्पर्धा का है इसमें व्यक्ति को सजग, सावधान व जागरूक रहकर उपलब्ध संसाधनों का मितव्यततापूर्ण उपयोग करना चाहिए परन्तु खेद का विषय है की हमारा जाट समाज आज भी अनेक कुरीतियों व सामाजिक बुराइयों से ग्रस्त बना हुआ है I हालांकि हमने समय के साथ-साथ अपने समाज में सामाजिक चेतना लेन का प्रयास किया है और समाज के बहुत से चिंतको, विचारकों व शिक्षित अग्रणी लोगों से इन सामाजिक बुराइयों पर लोगों को आगाह भी किया और विरोध भी मगर हमारा समाज में अन्य जातियों के मुकाबले शिक्षा के क्षेत्र में काफी पीछे है वहीँ स्वयं को मार्शल कौम से विभूषित करते हुए परस्पर मतभेद कायम रखते हुए संगठित भी नहीं हो रहा I कृषि के क्षेत्र में अधिपत्य तो है ही आज व्यापार और नोकरी-पेशा में भी अपनी हाजरी दर्ज़ करवाने के बावजूद भी हम राजनितिक दृष्टि से बहुत पिछड़े हुए है और हमारी जनसँख्या के अनुपात में सरकार में भागीदारी नहीं मिल रही और जो लोग राजनीति में हमारे नुमांइंदे है उन्होंने हमेशा समाज के हितों की बजाय अपने व्यक्तिगत हितों को प्राथमिकता देते रहे और समाज का इस्तेमाल स्वार्थपूर्ति हेतु करते रहे है I
आज हमारी सबसे पहली समस्या शिक्षा के प्रति जागरूकता की कमी है क्योंकि हमारा समाज ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्र से सम्बन्ध रखता है जहाँ अच्छे व गुणवता वाले विद्यालयों का आभाव है और उन्हें अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलवाने हेतु शहरों की और जाना पड़ता है जो काफी महंगा होने के कारण ज्यादातर लोग वहन नहीं कर पाते है तथा अपने बच्चों को उनकी पढाई बीच में ही छुड़वा लेते  है I शिक्षा आज की प्राथमिकता और व्यक्ति की उन्नति का आधार होती है I हर क्षेत्र में आज प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है जिसमे हम बिना शिक्षा के खड़े नहीं रह सकते I कहने को तो हम अपनी साक्षरता दर बढ़ा रहे है परन्तु इंजीनियरिग, मेडिकल और प्रशासनिक सेवा क्षेत्र में हमारा प्रतिनिधित्व बहुत ही कम है अत: हमें अपने बच्चों को बेहतर, गुणवत्तापूर्ण और अच्छी शिक्षा दिलवानी चाहिए तथा लोगो में शिक्षा के प्रति विशेष जाग्रति लेन का प्रयास करना होगा तभी हम अपने समाज जो दुसरे लोगों के बराबर ला पाएंगे I
हमारी दूसरी समस्या समाज में व्याप्त नशाखोरी है जो न केवल कर्ज़ में डुबो रही है बल्कि युवा पीढ़ी को खत्म कर रही है I जिस समाज और देश का युवा खत्म हो जाता है उसके लिए अपना वजूद बचना मुश्किल हो जाता है I नशा नाश का मार्ग होता है और हम शराब, अफ़ीम, भुक्की, गांजा,तम्बाकू, जर्दा के साथ साथ स्मेक, ब्राउन शुगर इत्यादि नशों में फंस कर अपना और अपने परिवार का नाश कर रहे है I हमारे समाज में विवाह-शादियों में और बुजुर्ग की मौत के अवसर पर मनुहार के नाम पर शराब और अफीम का जो खेल खेला जाता है वो न केवल सामाजिक बुराई है बल्कि समाज के लिए शर्मिंदगी व कलंक है I लोगों को सामाजिक दवाब में परम्परा निभाने की एवज में न केवल कर्ज़ में दबना पड़ रहा है, युवा वर्ग को नशे की अंधे कुए में धकेलने का काम भी हम कर रहे है I इसलिए हमे इस बुराई को खत्म करने हेतु जागरूकता लानी होगी और पहल भी करनी होगी I
हमारे समाज में दूसरी बड़ी समस्या दहेज़ रूपी दानव की है जो हमारी बहन-बेटियों को तो निगल ही रहा है साथ ही माँ-बाप को कर्ज़ के दलदल में धकेल रहा है और सामाजिक रिश्तों को खत्म कर रहा है I हिन्दू धर्म में कन्यादान और यथाशक्ति-यथासमर्थ दाज व दान का तो महत्व तो बताया गया है परन्तु आज यही परम्परा दानव का रूप ले चुकी है और सामाजिक स्पर्धा और इज्जत के नाम पर इसको कुरीति बना दिया है जो आज  कन्या भ्रूण हत्या के लिए व लिंगानुपात बिगड़ने के कारण अपराध और अराजकता के लिए सीधे तौर पर उत्तरदायी है अत: हमे दहेज़ के दंश से समाज को मुक्त करते हुए कन्यादान को सर्वोपरी स्वीकार करते हुए इस कुरीति को भी खत्म करना होगा I
आज जाट समाज के विरुद्ध दुसरे लोगों द्वारा किए जा रहे भ्रामक दुष्प्रचार का सामना भी करना है और उनको उचित मंच व माध्यम से जवाब भी देना है इस सब के लिए हमें अपने व्यक्तिगत हित व स्वार्थ छोड़ कर अपने समाज की उन्नति और भविष्य के बारे में सोचना होगा  I  हमे अपने समाज को एकजुट रखते हुए स्वस्थ, सभ्य, स्वच्छ, समृद्ध. शिक्षित और सुंदर समाज का निर्माण करने में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए और जो लोग हमें नेतृत्व दे रहे है उन्हें अपने समाज के प्रति जवाबदेह बनना होगा या बनाना होगा तथा सामाजिक संगठनों के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराई बारे खुले मंच पर चर्चा करते हुए उनका उचित समाधान निकल कर समाज को उन्नत व सक्षम समाज बनाना होगा तभी हम अपने समाज के कर्ज़ से मुक्त हो पाएंगे और इस पावन व क्रन्तिकारी कार्य को हमारी युवा पीढ़ी ही सरंजाम तक पंहुचा सकती है इस लिए आओ मेरे युवा साथियों हम सब मिलकर स्वामी विवेकानंद के कथन “उठो,जागो और तब तक मत रुकों जब तक मंज़िल ना मिल जाये “ को सार्थक करे और सक्षम बने I

18/02/2015 

Saturday, 14 February 2015

वास्तविक समृद्धि और समाज – डा. शीशपाल हरडू

सामान्यत: लोग समृद्धि का अर्थ आर्थिक सम्पनता से से लगाते है और ऐसा सोचना इस भौतिकवादी युग में स्वाभाविक भी है परन्तु आज पाश्चात्य रहन-सहन. खानपान और सोच से समाज इतना प्रभावित हो रहा है की अपनी विरासत और परम्परा को हम खोये जा रहे है I हम प्रदूषणयुक्त वातावरण में जीने को तो मजबूर है ही, संयुक्त परिवार को छोड़ कर एकल जीवन को अपना कर भावी पीढ़ी को अवसाद व अराजक परिवेश उपलब्ध करवा रहे है I आज हमारा युवा दिशाहीन,  उद्देश्यविहीन होकर उद्दंड व नकारात्मक गतिविधियों में संलग्न होकर अपना भविष्य, स्वास्थ्य ,आचरण व चरित्र  बिगाड़ रहा है, सोच छोटी कर रहा है और विचार दूषित कर रहा है I आज धन की अंध दौड़ में हम अपने संस्कार छोड़ रहे है , बड़े-बुजुर्गों का आदर सत्कार नहीं हो रहा है, मूल्यों को दांव पर लगा रहे है , युवा पाश्चात्य जीवनशेली अपना रहा है I
 आज हमें भौतिक समृद्धि की बजाय हमारे नोजवानों को स्वास्थ्य से, चरित्र से, विचारों से ,संस्कारों से,शिक्षा से और सोच से समृद्ध बनना होगा I अगर हम स्वस्थ है तो परिश्रम से धन अर्जित कर सकते है , चरित्र व शिक्षा से समृद्द है तो धन अर्जित करना सुलभ हो जायेगा, विचारों व सोच में सकारात्मकता धन अर्जित करने के नये रास्ते उपलब्ध करवाएगा और संस्कारों से समृद्धि धन अर्जन को स्थायी बना देगा I एक कहावत की अगर आपका धन खो गया तो कुछ नहीं खोया, स्वास्थ्य खो गया तो कुछ खोया और अगर चरित्र खो गया तो सब कुछ खो गया I आज समाज में चरित्र सबसे दुर्लभ और कमजोर पक्ष है, विश्वास ख़त्म होता जा रहा है, समाज में भष्टाचार व दुराचार चरम पर है, विचार व संस्कार मर रहे है, स्वास्थ्य नशे की मार झेल रहा है और शिक्षा मूल्यहीन व बिकाऊ बनती जा रही है I
ऐसे में आज जरुरत है अपने युवा साथियों को सकारात्मक व गतिशील वातावरण देते हुए उन्हें आर्थिक समृद्धि के साथ साथ स्वास्थ्य, चरित्र, विचार, संस्कार, शिक्षा  और सोच से समृद्द बनना होगा ताकि समाज को उन्नति व प्रगति के मार्ग को स्थायी स्वरूप मिल सके और हमारे नोजवान साथी अपना कल पूर्णतया सुरक्षित बना सके , समाज का हर तबका शांति, सदभाव, प्रेम व सहकार से जीवन जी सकें और समृद्ध समाज का निर्माण हो सकें I

14/02/15 

Sunday, 8 February 2015

जननी को जनमने दो, जन्मी को जीने दो

जननी को जनमने दो, जन्मी को जीने दो
डा.शीशपाल हरडू
हमारा देश, समाज और हम लगातार प्रगति कर रहे है मगर इस उन्नति की डगर में एक काला दाग भी लगा रहे है हम I आज हम अपनी ही बेटियों को माँ का मुंह नहीं देखने दे रहे, उन्हें ज़िन्दगी का पहला साँस भी नहीं लेने दे रहे और उसे कोख़ में ही क़त्ल कर रहे है तथा महापाप व कुकृत्य के भागीदार तो बन ही रहे है, समाज में अराजकता, अपराध और असंतुलन को भी बढ़ावा दे रहे है I समाज में ये दो मान्यताये एस कुकृत्य को बढ़ावा दे रही है की बेटा बुढ़ापे का सहारा होता है अगर ऐसा होता तो आज इतने वृद्धाश्रम क्यूँ खुल रहे है दूसरा की बेटा कुल का नाम चलता है जबकि आज की भौतिकवादिता की दौड़ में युवा देश विदेश में नोकरी व्यवसाय कर रहे है जहाँ कुल गोत्र की पहचान न होकर स्वयं की और उसके काम की होती है I बेटा तो एक घर का दीपक होता है जबकि बेटी दो घरों को अपना बना कर अपने गुणों व संस्कारों से महकती है ,चमकती है फिर भी जाने क्यूँ माँ बाप अपनी निर्दोष बेटी के खून से रंगी रोटी खा कर अमानवीय कृत्य कर रहे है I
हम बचपन से पढ़ते और सुनते आए है की माँ और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर होती है,आज हम यही बात भूल कर अपनी माँ और मातृभूमि दोनों का अपमान कर रहे है I जिसने हमें जन्म दिया और जिसकी वजह से हम इस दुनिया में आये है उसी स्त्री का जन्म से पहले ही क़त्ल कर देना पाप ही नहीं एक घिनौना कुकृत्य व दानवीय आचरण हैI  प्रकृति ने केवल नारी को ही ये क्षमता, गुण और शारीरिक बनावट दी है, हमारा जन्म नारी के बिना सम्भव नहीं तो फिर नारी का ही इतना अपमान क्यूँ ?  क्यों नहीं आने दे रहे इसे इस दुनियां में ? हमें माँ, बहन, पत्नी,  सब प्यारी लगती है तो फिर बेटी क्यों नहीं ? बेटी ही तो कल समाज में माँ, बहन और पत्नी की की भूमिका निभायेगी I एकबारगी हम मान भी ले की आपको बेटी नहीं , बीटा चाहिए तो कल आप अपने बेटे के लिए बहु कहाँ से लाओगे, आखिर बात फिर वहीँ आकर ठहरती है की अगर लड़की नहीं होगी तो संसार कैसे चलेगा I हम सब इस हकीकत को जानते हुए भी निर्दयी बन कर अपने की खून का क़त्ल करने को हो जाते है , आखिर समाज किस और जा रहा है, हमारी मानवीयता और नैतिकता कहाँ मर गई ? हम क्यों अपनी अजन्मी बेटी को बिना किसी कसूर के मार रहे है ,आपकी संवेदना व ममता कहाँ चली जाती है ? आज बेटी मरी जा रही है जिसका कोई गुनाह नहीं और हम गुनाह करके भी जिन्दा है ? इस बात पर विचार केवल हम माँ बाप ही कर सकते है कोई दूसरा नहीं I
हम सब जानते है की हमारी जिन्दी में बेटियों का क्या महत्व है, हम यह भी समझते है कि बेटी के बिना सृष्टि का कोई अस्तित्व नहीं I फिर भी सामाजिक कुरीतियों, विकृत मानसिकता, दानवी दहेज़ और घर से बहार असुरक्षा ने इस भेदभाव व  अपराध को और मजबूती दी और बेटियां बोझ लगाने लगी I जब समाज में बेटी असुरक्षित होगो तो फिर कौन और क्यूँ चाहेगा बेटी? जिस प्रकार प्रकृति ने बेटी को विशेष बनाकर इस सृष्टि में भेजा है और हमारी संस्कृति ने इसे विशेष दायित्व दिए है उसी प्रकार हमें भी बेटी को विशेष शिक्षा,विशेष सुरक्षा, विशेष वातावरण और विशेष स्वास्थ्य व्यवस्था  का निर्माण करना होगा तथा हमारी सोच को सकारात्मक बनाना होगा तभी इस गंभीर मर्ज़ का इलाज संभव है I कहते है की भगवान बेटी उसी को देता है जिसकी बेटी पालने की हेसियत हो तो हम सबको आदर्श समाज की स्थापना करने हेतु हेसियातवान बनना होगा और  इस कलंक को मिटा कर संसार की सबसे सुंदर कृति  को अपने आँगन में सहर्ष खेलने देना होगा, तभी जननी जन्मेगी ही और जन्मी बेटी जी भी पायेगी I हमें ऐसा परिवेश, वातावरण और विश्वास कायम करना होगा की बेटीया घर की दहलीज़ से लेकर आसमान तक सुरक्षित रहे और पुरुष अपने पुरुषार्थ का सम्मान करते हुए नारी रक्षा व सुरक्षा को अपनी सोच में स्थान दे, बेटियों का सम्मान करे और बेटी जन्म पर अभिमान करे तभी इस सामाजिक कालिख को साफ कर पाएंगे और बेटी को अपना अधिकार भी दे पाएंगे I आओ हम सब अपना दृष्टिकोण बदले और समाज के क़र्ज़ को चुकता करे, बेटी जन्म को देवी अवतार या पर्व के रूप में मनाये तथा नारी की रक्षा, सुरक्षा को अपना कर्तव्य समझते हुए समाज में संतुलन, समानता और स्वस्थता प्रदान करें I   

08/02/15   

Monday, 2 February 2015

आत्मविश्वास और साहस ही है सफलता का साधन – डा. शीशपाल हरडू

आत्मविश्वास और साहस ही है सफलता का साधन – डा. शीशपाल हरडू
 साहस से आशय उस आंतरिक शक्ति से है जो किसी व्यक्ति को कार्य करने के लिए प्रेरित करती है I साहस को प्रभावित करने वाले मुख्य तत्व है एहसास, दृष्टिकोण और भावना I साहस समृद्दी की राह बनता है और साहस बिना सफलता प्राप्त नहीं हो सकती I साहस हेतु मनुष्य में तत्परता, सतर्कता, उद्दयम और दृढनिष्ठा नामक गुण होने आवश्यक है वहीँ लगन,हिम्मत, आत्मविश्वास और मनोबल के बिना कोई भी लक्ष्य या मंज़िल नहीं मिल सकती I यह शरीरिक बल, मनोबल और धनबल की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है I डरपोक प्रकृति वाले, भयभीत व आशंका से ग्रस्त व्यक्ति असंमजसता में पड़ कर अवसर का लाभ नहीं उठा पते है और निर्णय न ले सकने के कारण असफल हो जाते है I खोने का डर, असफलता का भय और आशंका की चिन्ता रखने वाला व्यक्ति या तो निर्णय ले नहीं पता या फिर इतनी देर से निर्णय लेता है की उसका लाभ उसे नहीं मिल पता I साहस व्यक्ति में तभी आता है जब उसके पास कुछ करने का उद्देश्य हो, मकसद हो और उसमें उस कार्य को करने का जनून हो,  जिस कार्य के प्रति हमारे मन में हीनभावना होती है वह कार्य हमसे नहीं हो पता I साहस एक अंतहीन सिलसिला है जिससे हमें हर बार एक नया आत्मविश्वास मिलता है और ज्यों ज्यों हम नई चुनोतियों को स्वीकार करते है , हमारा साहस व हिम्मत बढती जाती है और मन के अन्दर छिपा भय ख़त्म होता चला जाता हे I
अगर हम साहस का मतलब हिम्मत या कठिन काम करने को ही कहते है तो क्रूर आतंकवादी भी तो दुस्साहसपूर्ण कार्य करते है परन्तु सच्ची साहसिकता, शुद्ध रीति-नीति, प्रखरता व पवित्रता के साथ मानवीय पथ पर चलते हुए अंत:प्रेरणा व आत्मविश्वास के साथ कार्यों को संपन्न करना सही मायने में साहस है I साहस ही ऐसी शक्ति है जो असंभव को संभव बनता है और जो इसका महत्व समझ लेता है वह अपने लक्ष्य को प्राप्त करके ही दम लेता है I कौन क्या करता है और कितना सफल होता है इस बात का महत्व नहीं होता ब्लकि महत्व इस बात का होता है की किसने कितने लग्न, निष्ठा,विश्वास और आत्मविश्वास के साथ कार्य को संपन्न करने में अपनी शक्ति लगाई और जितनी मजबूती व शक्ति के साथ अवरोधों को दूर करने तथा दृढभाव से लक्ष्य की तरफ चलते हुए साहसपूर्ण कदम उठाया I साहस ही सफलता के लक्ष्य तक पहुंचा सकता है I
परिस्थितियां किसी के भी साथ न तो सदा अनुकूल रहती है न प्रतिकूल और न ही किसी एक वर्ग या व्यक्ति के किए बनती है इसलिए सदा अनुकूलता की उम्मीद करना न केवल व्यर्थ है , अनावश्यक, अनुचित व हानिकारक भी है I उचित ये होगा की आप अपनी साहसिकता, आत्मविश्वास और सहन शक्ति बढ़ाये ,जो अनिवार्य हो उसे धेर्यपूर्वक सहन करते हुए बुद्धिमत्ता पूर्ण सोच-विचार कर निर्णय लेते हुए संकट का उचित व परिस्तिथियों के अनुरूप संकट व समस्या का हाल ढूंढे , जो उचित हो वे उपाय सोचने और प्रयास करने में कोई कमी न रहने दी जाये, हर स्थिति में संतुलन बनाये रखा जाये, कठिनाइयों व मुसीबतों से दार नहीं. वरन अपनी प्रतिभा से हाल व उपाय निकालने में बिना समय गवांये लग जाना ही साहस कहलाता है I साहस वह हथियार है जी प्रतिकूलता को अनुकूलता  में बदलना संभव बनता है I सामान्यत: लोग साहसी व्यक्ति का ही साथ देना चाहते है और उसी के नेतृत्व में नये चुनौतीपूर्ण व गैर-पारम्परिक तरीके से कार्य को करने और सफलता प्राप्त करना चाहते है I जिस प्रकार आत्मविश्वास व्यक्ति में क्षमता का संचार करता है उसी तरह साहस उसमें उर्जा उत्पन्न करता है और व्यक्ति की जीवनचर्या में किए जाने वाले कार्यों में इसका सर्वाधिक महत्त्व और ये तमाम निर्णय की शक्ति का केंद्र बिन्दु होता है I
हम वही करना पसंद करते है जिसमे सफलता सुनिश्चित हो, जोखिम उठाना तो मुर्ख लोगों का काम है, हम हर नया काम हाथ में लेने से पूर्व कई बार सोचते है ,यकीनन सोचना भी चाहिए परन्तु इतना भी ना सोचे की साहस का क़त्ल हो जाये ,Iहम ज्यादातर सावधान रहना पसंद करते है और छोटे व तुच्छ तनाव और संघर्ष से बचने का प्रयास करते है जो एक दिन हमारी नाकामी व असफलता का मार्ग बन जाता है I किसी भी काम के परिणाम के दार से दहशत में आकर उस चुनौतीपूर्ण कार्य को हाथ न लगाना सावधानी नहीं बल्कि पलायन की पहचान है I साहसी व पराक्रमी लोगों की जीवनी पढ़ कर हम निश्चित तौर पर कह सकते है की सावधान होने की बजाय साहसी होना बेहतर है I तक़दीर हमेशा युवाओं को प्रेयसी होती है क्योंकि युवा हमेशा सावधान कम और उत्साही ज्यादा होते है तथा वे साहस दिखाकर तक़दीर के स्वामी ही नहीं बादशाह बन जाते है I
जब हम अनजानी बातों से डरते है, परिवर्तन से घबराते है तो इसका सीधा अर्थ है की हम नया नहीं लकीर के फ़क़ीर बने रहना चाहते है, अपने सपनो को पूरा करने से डरते हुए अपनी ज़िन्दगी में बदलाव से पहले यथास्थितिवादी बने रहना चाहते है जबकि हम भूल जाते है की हर महान आविष्कार इन अनजानी स्थितियों के प्रति साहस दिखने से ही संभव हुई है I स्वामी विवेकानंदका कथन कि-“विश्व के अधिकांश लोग इसलिए असफल हो जाते है की उनमें समय पर साहस का संचार नहीं हो पता और वे भयभीत हो उठते हैं I इस प्रकार एक आम आदमी को वास्तविक ज़िन्दगी जीने के लिए साहस रूपी जज्बे की उतनी ही जरूरत  होती है जितनी किसी महान योद्धा को I साहस हर व्यक्ति में होता है , जरूरत बस इतनी है कि वो खुद को पहचाने , क्षमता को जाने और पूर्ण निष्ठा, तन्मयता और एकाग्रता के साथ मंजिल की और एक मजबूत कदम  बढ़ने की I
मनुष्य का जीवन एक संघर्ष का मैदान है ,योग्यता रखने वाला इस संघर्ष की आग में तपकर अपना व्यक्तित्व निखारता व सफलता प्राप्त करता है I सफलता केवल ईमानदारी व मेहनत करने वाले जुझारू व्यक्ति के ही सर का ताज बनती है और आलसी, असंजस व निर्णयविहीन व्यक्ति को सफलता ही हासिल होती है I अवसर हर व्यक्ति के जीवन में आता है ,पता नहीं कब हमारा दरवाजा खटखटा दे ,परन्तु जो जो अवसर को पहचान ले , समझ ले वह लक्ष्य को पा लेता है और इंतजार करने वालों को वही मिलता है जो कोशिश करने वाले अनावश्यक व अनुपयुक्त समझ कर छोड़ देते है I लक्ष्य प्राप्ति हेतु मन में तीव्र कामना, दृढता , उत्साह,लग्न व एकाग्रता के साथ साथ लक्ष्य भेदने, मुकाबला करने और  योग्यता के दम पर उद्देश्य की तरफ बढ़ना होता है I यदि व्यक्ति उद्देश्यों को पाने के लिए निरंतर निश्चयपूर्वक चिन्तन करता है तो उसे सफलता अवश्य मिलती है I ज़िन्दगी की कहानी में मनोबल व साहस नामक दो नायकों और निराशा व आलसय नामक खलनायक अपना किरदार निभाते है और उसी से हमारी सफलता या विफलता तय होती है I
  हमें जिस भी वस्तु की चाह होती है उसे पाने के लिए हमारे मन में तीव्र इच्छा होना ही काफी नहीं , बल्कि उसे प्राप्त करने के लिए उसकी मह्तानुसार हमारा प्रयत्न भी निरंतर व अथक पुरे       आत्मविश्वास के साथ होना चाहिए , सफलता भाग्य के सहारे नहीं , अपितु वीरता, कुशलता, कर्मठता , विश्वास और साहस के बल पर ही मिल सकती है I प्राय: जब भी कोई विद्यार्थी किसी प्रतियोगिता में असफल होता है तो वह भाग्य को कोसता है , जबकि यह सर्व सिद्ध है की जैसा हमारा आत्मविश्वास होगा , वैसी ही लक्ष्य की प्राप्ति होगी I साहसी व्यक्ति आत्मविश्वासी होते है अहंकारी नहीं I आत्मविश्वास उस अनुभूति का नाम है जो व्यक्ति को उसकी योग्यता से प्राप्त होती है और जिसकी वजह से वह अपना काम पूरा करने की सामर्थ्य रखता है, मनुष्य  को अपनी कार्यक्षमता, कार्यकुशलता और योग्यता का लक्ष्य प्राप्ति में सहयोग लेना चाहए न की अहंकार के रूप में I
इसलिए हाथ पर हाथ रखकर बैठने वाला आलसी व्यक्ति अपने भाग्य को कोसता है I हाथ की लकीरों से भाग्य कभी नहीं तराशा जा सकता ,भाग्य मेहनत व कर्मठता बनता है , किस्मत तो उनकी भी होती है जिनके हाथ नहीं होते I निराशा को कभी भी किसी भी हालात में अपने ऊपर हावी न होने दें , क्योंकि मन के हरे हर है , मन के जीते जीत I दृढ आत्मविश्वास और उच्च मनोबल  ही सब सफलताओं की कुंजी होती है , परिश्रम ,अनुशासन ,एकाग्रता और आत्मविश्वास को कोई विकल्प नहीं होता I अत: भाग्य रूपी सफलता साहसी का ही साथ देती है क्योंकि आत्मविश्वासएक भावना है और उसका कार्य रूप है साहस I जब हम अपने विचारों को कार्यरूप देने का निश्चय पूर्वक साहस करते है तभी हमें सफलता रूपी सिद्धि मिलती है I
2/2/2015