जुझार शब्द का
शाब्दिक अर्थ :
1. वि. (हिं.
जुज्झ+आर I प्रत्यय I) योद्धा, लड़ाका : पुं. युद्ध , लड़ाई जैसे का जानसि कस होइ
जुझारा – जायसी और आंग्ल भाषा में – A Warrior यानि एक योद्धा वहीँ जुझाऊ विशेषण (Adjective)
के रूप में वि. (हिं.जूझ+आऊ I प्रत्यय I) अर्थ प्राय: जूझता या लड़ता रहने वाला;
लड़ाका ; युद्ध या लड़ाई के उपयोग में आने वाला :युद्ध सम्बन्धी जैसे जुझाऊ जहाज
यानि Hard Worker, Figher, Berserk और स्त्री. के रूप में जूझने की क्रिया या भाव
: युद्ध , लड़ाई (यह केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है
2. जुझार शब्द में
अक्षरों की संख्या व्यंजन मात्रा सहित पांच है , इस शब्द का प्रयोग हिंदी में
विशेषण के रूप में किया जाता है I यह एक संयुक्त पद है जिसके अंत में प्रत्यय जुड़ा
हुआ है जिसकी उत्पत्ति हिंदी भाषा से हुई है I
3. जुझार होना उन बहादुरों के लिए प्रयोग किया जाता है जो युद्ध में गर्दन कटने के बाद भी पांच-पांच कोस तक बिना सर के लड़कर दुश्मनों का नाश करते है I
4. हमारे क्षत्रिय
समाज में एक नहीं अनेको नामी और गुमनामी जुझार दिए है; जिस समाज में शिक्षा, संख्या
,समृधि और जागरूकता ज्यादा रही या जो प्रभावशाली रहा उस समाज के जुझार का नाम और
इतिहास दोनों का नाम भी हुआ और पहचान भी हुई , इतिहासकारों ने भी अपनी कलम में जगह
दी परन्तु जो समाज शिक्षा, संख्या ,समृधि और जागरूकता में पिछड़े रहे उस समाज के
वीर जुझार का नाम वक्त की धुल के नीचे दब कर रह गया जबकि महापुरुषो ,वीरों ,
शूरवीरों और जुझारों को किसी एक जाति, समाज ,प्रदेश या देश की सीमा में नहीं बांधा
जाता ये सबके सिरमोर होते है I समाज की सीमा शूरवीरो को बांध नहीं सकती परन्तु
सामाजिक व राजनेतिक ढांचे में इतिहास केवल ताकतवर का ही लिखा जाता है और यही हमारी
विडंबना है I
5. हमारे हरडू गोत्र
के जुझारजी दादा की देवली और कुता झाड़ जो गाँव घंटियाल में है के बारे में हमारे
ढाढ़ी (मिरासी) द्वारा उपलब्ध जानकारी अनुसार 1444 में गाँव घींटाळ जो आज घंटियाल
है बिदावत राजपूतो द्वारा गायों को पानी
पिलाने से रोकने और हरडू परिवारों के साथ लूटपात करने के विरुद्ध लड़ते हुए राऊजी
,लांछा बाई और एक कुता काम आया I गाँव घंटियाल में आज भी लांछा तलाई , कुता झाड़ और
जुझारजी दादा समेत चार देवली है इन देवलियो पर लिखी लिपि सामान्य जनमानस पढ़ नहीं
पता जिसे पुराणिक एवम पुरातत्व विभाग से पढवाने बारे प्रयास जारी है , इसीप्रकार
गाँव उमादेसर में 1519 में बनी पांचा जी की घोड़े सहित छतरी पर भी लिखा शिलालेख पुराणिक
एवम पुरातत्व विभाग से पढवाने बारे प्रयास जारी हैI पुराणिक एवम पुरातत्व विभाग से
शिलालेख पढवाने , बही भाट (राव) और अन्य
पुराणिक व ऐतिहासिक दस्तावेज जुटा कर हम पूर्वजो का इतिहास तथ्यों सहित इकट्ठा कर
रहे है
आप सभी जागरूक
समर्पित हरडू भाइयों दे निवेदन है की इस पावन कार्य में अपना अमूल्य सहयोग प्रदान
करे और अपना गोरवशाली इतिहास को लिपिबद्ध करवाए I
हमें हमारे कुल देव का पता लगाना ही चाहिए और इसमें सब का सहयोग जरूरी है
ReplyDeleteजरूर जी
DeleteJunjhar kisi bhi smaj ka gourv hota hae, hmen apne kul bujargo ka smman krna chahiye
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