Saturday, 24 January 2015

भारत की विरासत “समृद्धि और नैतिकता”

भारत की विरासत “समृद्धि और नैतिकता”
डा.शीशपाल हरडू
समृद्धि का सामान्य अर्थ हम संपन्नता से लगाते है वहीँ सुख,सुविधा को समृद्धि का पर्याय मानते है, जबकि ऐसा नहीं है I सुख सहजता में, त्याग में, परोपकार में या संतोष में मिलता है ,समृद्धि तो मात्र साधन है परन्तु आज हम समृद्धि को ही सुख मानने लगे हैं, सुविधा को ही सब कुछ मानने लगे है और आज समाज में कोई भी रिश्ता-नाता समृद्धि से बड़ा नहीं माना जाता जो समाज के ह्रास का सूचक है I सामान्यत लोग समृद्धि को केवल भौतिक और अध्यात्मिक रूप में ही समझते है और स्वीकार करते हैI भारतवर्ष चिरकाल से अध्यात्मिक रूप संपन्न देश रहा है ऋषि-मुनिओं ने, संत महात्माओं ने ग्रंथो ,वेद-पुराणों में अध्यात्मिक समृद्धि के अनेक सिद्धांत ,मत व प्रयोजन बताये, समझाये है और अकाट्य प्रमाण भी दिए है I ईश्वर द्वारा रचित सृष्टि में मानव द्वारा की गई  क्रिया से परिणाम/ प्रतिक्रिया उत्पन्न होता है जिसका प्रभाव इस सृष्टि के पदार्थ पर पड़ता है, मानव विवेकशील और गुण-अवगुण युक्त प्राणी है इस लिए उस द्वारा की गई प्रत्येक क्रिया उसकी शांति व समृद्धि को भी प्रभावित करती है और शांति व समृद्धि के लिए गीता  में ‘गुण सिद्धांत’ और ‘निष्काम सिद्धांत’ दिए गए है ,जो विश्व हित हेतु समरसता , शांति व समृद्धि स्थापित करने में सहायक है I गुण सिद्धांत अनुसार प्रकृति से सत्व, रजस और तमस गुण उत्पन होते है ओर मनुष्य इन गुणों के साथ बंधन स्वीकार कर लेता है तथा शारीर, इन्द्रियां ,मन, बुद्धि व पदार्थ सब गुणमय हो जाते है और इनसे होने वाली क्रिया कर्म कहलाती है I सत्वगुण सुख में, रजोगुण सकाम कर्म में और तमोगुण आलस्य में मानव को स्थिर करता है I मनुष्य में जिस गुण की अधिकता होगी उसी के अनुसार कार्य व क्रिया करता है I वर्तमान में तमोगुण की प्रधानता दिखाई देती है, प्रत्येक मानव स्वार्थ से ग्रस्त है, हर कार्य अपेक्षा पूर्ण होता है, अपेक्षा की पूर्ति न होने मानसिक तनाव व अवसाद ग्रस्त रहता है और अपने स्वभाव में कटुता, हीनता, द्वेष, इर्ष्या को अपना रहा है और आज हालात विस्फोटक हो चुके है I आज विश्व शांति व समृद्धि के लिए मनुष्य में सत्व गुणों को विकसित करने की आवश्यकता है I  मनुष्य को  कर्म की अनिवार्यता को स्वीकार करते हुए सकाम कर्म व निष्काम कर्म का स्व-विवेक से निर्धारण करना चाहिए I सकाम कर्म में चाह, इच्छा, आकांक्षा छुपी होती है जिसमे समरसता व सद्भावना का आभाव होता है अत: आज  निष्काम कर्म की आवश्यकता है जिससे बिना किसी अहंकार, ममता या आसक्ति के कर्म किया जाये ओए जो समुदाय, समाज, देश और विश्व हेतु शांति व समृद्धि का रास्ता कायम कर सके I
आज दुसरे अर्थ में समृद्धि को भौतिक समृद्धि के रूप में लेते है, आज मनुष्य को वस्तु मान कर मूल्य निर्धारित कर रहे है I अर्थ या धन साधन होता है साध्य नहीं परन्तु आज मानव दास और धन स्वामी बन कर पेश हो रहे है , रिश्ते दोलत से तोले जाने लगे है ज़िन्दगी का मकसद सर्वाधिक धन इकट्टा करना बना लिया है I भौतिकता की अंध दौड़ में मनुष्य,समुदाय, समाज, देश और विश्व की तमाम परम्पराएँ, मर्यादाएं व सिद्धांत बेमौत मर रहे है और मानव एकल होता जा रहा हैI आर्थिक सम्पन्नता की चाह में हम  मानवता की बलि चढ़ा रहे है, रिश्तों का खून कर रहे है, ममता, करुना, प्रेम, प्यार और सहचार को भूल कर निर्जीव दौलत से प्यार कर रहे है I माना जीने और जीवनयापन के लिए धन जरूरी है परन्तु ज़िन्दगी का मकसद धन को बना कहाँ उचित हैI कहते है की जिस गृहस्थ के पास धन नहीं वो दो कोडी का और जिस संत के पास धन हो वो दो कोडी का होता है , वहीँ ये भी कहा गया है की ईमानदारी और मेहनत की कमाई ही बरकत करती है बेईमानी से कमाया धन भावी पीढ़ियों को खत्म कर देता है I इसीलिए हमारे शास्त्रों में हमारी कमाई का दसवां हिस्सा दान पुन्य में खर्च करने का नियोजन रखा है ताकि यदि गलती से भी अनीति का धन आ जाये तो वो खुद पर खर्च ना हो सके Iजैसा खायेंगे अन्न वैसा ही बनेगा मन ; इसलिए ईमानदारी के धन से लाया अन्न हमारे मन, स्वभाव व सोच को शुद्ध व शांत रखता है और अनीति से कमाए अन्न को खाने से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है और अनैतिक पथ पर ले जाकर पतन में डाल देती है I
आज हमारे युवा साथियों के लिए अध्यात्मिक और भौतिक समृद्धि से ज्यादा शिक्षा, चरित्र, स्वास्थ्य , और वैचारिक समृधि की ज्यादा आवश्यकता है I आज प्रतिस्पर्धा और तकनीकीयुग है और इस युग में किसी व्यक्ति और देश की समृद्धि का पैमाना वहां की शिक्षा का स्तर से है I अब्राहम लिंकन ने शिक्षा के महत्व को स्वीकारते हुए कहा की “एक पीढ़ी में किसी कक्षा का दर्शन ही अगली पीढ़ी में सरकार का दर्शन होता है “ वहीँ भारत के ज्ञान आयोग के पुर्व प्रमुख सैम पित्रोदा ने कहा की “आजकल वैश्विक अर्थव्यवस्था, विकास, धन उत्पत्ति और संपन्नता की संचालक शक्ति सिर्फ शिक्षा को ही कहा जा जा सकता है I” शिक्षा का अर्थ अक्षर ज्ञान और साक्षर होने से नहीं बल्कि मूल्य आधारित, संस्कारित एवम ज्ञानपरक होना है I हमे शिक्षा से क्लर्क या मशीनी मानव नहीं बल्कि नैतिक व चरित्रवान नागरिक बनाने की जरूरत है जो अनुशासित, कर्मठ, ईमानदार और देश-भक्त नागरिक देश को से सके I आज फैशन ,पाश्चत्य शैली ,भौतिकवाद व बाजारवाद के दौर में युवा वर्ग के चरित्र में लगातार गिरावट एक चिन्ता का विषय है, आपके चरित्र से ही भविष्य का चित्र बनता है परन्तु अफ़सोस आज चरित्र की चादर मेली और बदरंग हो रही है , रिश्ते के तार, अपनेपन की डोर और देशप्रेम का जज्बा गायब हो रहा है I  आज सार्वजनिक हितों पर व्यक्तिगत हित हावी हो रहे है, चोरी, बईमानी, गबन, बलात्कार, उग्रवाद और नशा प्रवर्ती युवा वर्ग पर हावी हो रही है , राजनीति भ्रष्ट हो रही है I इसलिए आज के समय की प्रमुख मांग चरित्रवान नागरिक पैदा करने वाली शिक्षा की है ताकि देश और युवा सुरक्षित रह सके I
आज पाश्चात्य रहन-सहन और खानपान का हमारे स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ रहा है , देश की पूंजी उसके युवा होते है और उन पर शिक्षा के रूप में विनियोग करके भावी समृद्धि की बुनियाद रखी जाती हैI
परन्तु खेद का विषय है की आज योवनकाल कब आता है पता ही नहीं चलता I युवा का दूसरा रूप वायु होता है जिसके वेग की शक्ति का अनुमान लगाना नामुमकिन होता है ,युवा के जोश जज्बे और जनून पर ही देश के कल की तक़दीर लिखी जाती है I अत: आज जरूरत है युवा वर्ग को  स्वास्थ्य परक शिक्षा, पारम्परिक खेल और उचित वातावरण देने की , ताकि युवा शक्ति को सृजनात्मक व सकारात्मक कार्यों में लगाया जा सके और विघटनकारी व विध्वंसकारी कार्यों से दूर रखा जा सके I कहते है की स्वास्थ्य तन में ही स्वास्थ्य मन निवास करता है, स्वास्थ्य मन में ही स्वास्थ्य विचार आते है और विचारों से ही भविष्य बनता है I इसलिए हमें वैचारिक दृष्टि से समृद्ध होना परम आवश्यक है और वैचारिक दृष्टि से समृद्ध तब होंगे जब शुद्ध व सात्विक भोजन करने ,सकारात्मक सोच व लक्ष्य निर्धारित करने, स्वस्थ व व्यवस्थित रहने, स्वाध्याय करने, संस्कारित संगत करने , आदर्श शिक्षा लेने, प्रगतिशील व चिन्तनशील लोगो की जीवनी पढने , अच्छा व बौधिक साहित्य पढने, सकारात्मक सोच का विकास व नकारात्मक सोच का त्याग करने से और देश के नायक ,वीर सपूतों को आदर्श मानने से I शहीदे-आज़म भगत सिंह अपने अंतिम वक्त तक स्वाध्याय में लगे रहे और युवा साथियों को संदेश दे गए की विचार ना तो कभी बूढ़े होते है ना कभी मरते है बल्कि समय की कसौटी पर और तेज व तिक्खे होते जाते है I समय के साथ आदमी मर जाता है परन्तु विचार हमेशा जिन्दा रहते है, इसलिए हमें वैचारिक दृष्टि से समृद्ध शिक्षा युवा साथियों को देनी चाहिए ताकि अच्छे, प्रगतिशील, चरित्रवान और देशभगत नागरिक पैदा करके देश को समृद्ध बनाया जा सके I
आओ हम सब मिल कर भारत देश की विरासत “समृद्धि और नैतिकता” को संजोये, संवारें और पुनस्थापित करे ताकि देश को अध्यात्मिक,आर्थिक ,भौतिक रूप से मजबूत बनाते हुए शिक्षा, चरित्र, स्वास्थ्य, और वैचारिक रूप से समृधि बनाकर इसका लाभ हर एक नागरिक तक पहुँचाया जा सके और देश और देश के नागरिकों को सर्व संपन्न बनाया जा सके I
दिनांक 24/01/2015
  


Friday, 23 January 2015

जीवन का आधार- हमारे संस्कार

जीवन का आधार- हमारे संस्कार
डा.शीशपाल हरडू
संस्कार दो शब्दों का मेल है सम+कार अतार्थ सम का मतलब सम्यक या अच्छा और कर का मतलब कृति या कार्य, इस प्रकार संस्कार यानि अच्छा कार्य I संस्कार का सामान्य अर्थ है-किसी को संस्कृत करना या शुद्ध करके उपयुक्त बनाना। किसी साधारण या विकृत वस्तु को विशेष क्रियाओं द्वारा उत्तम बना देना ही उसका संस्कार है। वहीँ आध्यात्मिक अर्थ में मन, वचन, क्रम और शारीर को पाक पवित्र करना, हमारी प्रवृतियों और मनोवृतियों को शुद्ध व सभ्य बनाना संस्कार होता है  और व्याहारिक अर्थ में सद्गुणों को बढ़ाना व दुर्गुणों को घटाना और अच्छी आदत लगाना व बुरी आदत छोड़ना संस्कार है I संस्कार से ही हमारा सामाजिक और आध्यात्मिक जीवन पुष्ट होता है और हम सभ्य कहलाते हैं। व्यक्तित्व निर्माण में संस्कारों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। संस्कार विरुद्ध आचरण असभ्यता की निशानी है।मनुष्य जन्म के समय विशुद्ध प्रकृति होता है , संस्कार मिलने से सस्कृति और विकार मिलने से उसमें विकृति आ जाती हैI इसप्रकार अच्छे-बुरे संस्कार होने के कारण मनुष्य अपने जीवन में अच्छे-बुरे कर्म करता है, फिर इन कर्मों से अच्छे-बुरे नए संस्कार बनते रहते हैं तथा इन संस्कारों की एक अंतहीन श्रृंखला बनती चली जाती है, जिससे मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण होता है।
व्याहारिक दृष्टि से संस्कार का अर्थ इस उदहारण से भी समझा जा सकता है जैसे की केला खा कर छिलका फेंक देना एक साधारण कृति (कार्य) है, केला खा कर छिलका कूड़ेदान में फेंक देना प्रकृति है, केला खा कर छिलका सड़क पर  में फेंक देना विकृति है और दुसरे व्यक्ति द्वारा केला खा कर सड़क पर फेंका गया छिलका उठा कर कूड़ेदान में डालना संस्कृति है या यूँ कहें की भूख लगना और खाना खाना प्रकृति है,दुसरे का खाना खाना विकृति है और भगवान को अर्पित करके खाना खाना संस्कृति हैI संस्कार पूर्णतया विरासत में मिलते है, बच्चे माता-पिता से सबसे ज्यदा सीखते है फिर अपने गुरुजनों से और फिर अपने नजदीक के वातावरण और अपने दोस्तों से सीखते है Iबच्चे के पहले गुरू माता-पिता होते है अत: सर्वप्रथम माता-पिता को धर्म-स्वरूप व संस्कारी बनना चाहिए, जैसा कार्य माता-पिता करेंगे वैसा ही बच्चे करेंगे ;जैसे गुण आपके होंगे , बच्चे वैसा ही सीखेंगे I अच्छे बुरे की पहचान का विवेक और उनमें अंतर समझने योग्य संस्कार बच्चे को उसके माता-पिता से ही मिलते है I
सामान्यत: माता-पिता कहते रहते है की बच्चे बिगड़ गए है, दोस्त,रिश्तेदार या उस जन-पहचान वाले ने बिगाड़ दिया है लेकिन इससे माता-पिता का दोष कम नहीं हो जाता क्योंकि बच्चे को अच्छे संस्कार देने का श्रेय माता-पिता को जाता है तो बच्चे में अच्छे संस्कार न होने का दोष भी उन्ही पर ही आता है I मैं माता- पिता के दृष्टिकोण से नहीं बच्चो के दृष्टिकोण से बात करूं तो कई बार माँ-बाप बच्चों में संस्कार व अनुशासन इत्यादि सिखाने में इतने आगे निकल जाते है की हम अपना मूल उद्देश्य पूर्णतया भूल जाते है नतीजन डोर अधिक खिंच जाती है ,बच्चे में विद्रोही प्रवृति पैदा हो जाती है I अति हमेशा बुरी होती है और अति से लाभ कम और हानि ज्यादा होती हैI इसलिए हमेशा माता-पिता को बच्चों के साथ मित्रभाव व प्रेममय व्यवहार रखते हुए एक आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए I संस्कार आदेश, निर्देश, प्रवचन या पठन-पाठन से नहीं आते और न ही तत्व-ज्ञान ,कथा-कहानी या किसी लालच से आते है बल्कि संस्कार आपके द्वारा किए गए कार्यों व व्यवहार का अनुसरण करने से आते है जैसे आप बच्चे को बड़े-बुजर्गों चरणस्पर्श के संस्कार देना चाहते हो तो यदि हम उसे ऐसा करने का कहेंगे तो दो-चार दिन करने के बाद छोड़ देगा ; लालच दिखाओगे तो उसकी मांग बढती जाएगी और एक विकार का रूप ले लेगी ; गुण-दोष समझोगे तो भी वे लगातार नहीं करेंगे और धीरे धीरे विद्रोही व्यवहार दिखाना शुरू कर देंगे I
बच्चे अपने माता-पिता के व्यवहार,रहन-सहन और उनके आचार-विचार से संकर ग्रहण करते है , जैसा  व्यवहार आप करेंगे बच्चे उससे आगे व्यवहार करते है I जैसे आप बच्चे को बड़े-बुजर्गों चरणस्पर्श के संस्कार देना चाहते हो तो आपको अपने बड़े-बुजर्गों के चरणस्पर्श करने होंगे, बच्चे आपको देखेंगे की आप दादा-दादीजी के चरणस्पर्श करते है तो वो स्वत: आप का अनुसरण करते हुए आप जैसा व्यवहार करना शुरू कर देंगे और अपनी जीवनचर्या में स्थायी रूप में शामिल कर लेंगे I अत: संस्कार मौन रहकर आदर्श कृत्य करने से आते है I इसप्रकार माता-पिता को चाहिए की वे अपने बच्चों के सामने आदर्श , मर्यादित ,सन्तुलित और प्रेममय जीवन व्यवहार प्रस्तुत करते हुए अपने बच्चों को संस्कारवान बनाये I

अब कुछ चर्चा  माता-पिता के दृष्टिकोण से भी करते है I कोई भी माता-पिता ये नहीं चाहता की उनका बालक कष्ट में जीवनयापन करे, उसका बच्चा संस्कारहीन बन कर एक अपराधी जैसा जीवन जिए I इस संसार में तीन प्राणी ऐसे है जो आपकी निस्वार्थ उन्नति की कामना करते है- माता, पिता और गुरू I आज के भौतिकवादी व प्रतिस्पर्धा के युग में जहाँ संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार ने ले ली है, बच्चे दादा-दादी की बजाय किराये की आया की छत्र छाया में पल बढ़ रहे है तो बच्चों का माता-पिता के  प्रति लगाव व स्नेह कम होना स्वाभाविक है I आज बच्चे संस्कार दादा-दादी की कहानियों से नहीं टेलीविजन के नाटकों से ले रहे है ऐसे में बच्चों को उचित वातावरण उपलब्ध करवाना जहाँ माता-पिता का दायित्व है वहीँ बच्चों को सस्ते व हल्के दोस्तों और साहित्य से दुरी बनाते हुए, विकृत साधनों से दूर रहते हुए अपने माता-पिता के सपनो को समझने का प्रयास करना चाहिए तथा अपना भविष्य संस्कारों की सीडी बनाकर सफलता की मंज़िल तक पहुचना चाहिए I युवाओं को संस्कारित कृत्य करते हुए स्वम को अपने समाज के योग्य बनाकर तन, मन और मस्तिष्क से स्वस्थ रहकर अपने माँ-बाप के प्रति अपने फर्ज़ को निभाएं, अपने व अपने परिवार के दुःख-शोक मिटा कर शांति और समृद्धि का रास्ता खोलें व अपने जीवन को सुखद तथा सुंदर बनाये I

Wednesday, 21 January 2015

Time Management Matrix -जब काम हो ज्यादा और वक़्त हो कम

Time Management Matrix -जब काम हो ज्यादा और वक़्त हो कम
दोस्तों,आज हर व्यक्ति की ये शिकायत आम हो गई है की काम ज्यादा है और वक्त कम या यूँ कह दीजिये की व्यस्तता भरी जिन्दगी में कुछ महत्वपूर्ण का करने से चुक जाते है और कम महत्वपूर्ण काम करते रहते है ,कई बार इससे काफी परेशानी ,तनाव या नुकसान उठाना पड़ता है Iहमारा सब का अनुभव कहता है की हम उस दिन सबसे अधिक संतुष्ट होते है जिस दिन हमने सबसे ज्यादा काम निपटाए हों या समय का हमने अच्छे से उपयोग किया हो I हम चाहे लाख कोशिश करले फिर भी कुछ समय ऐसा बर्बाद हो ही जाता है जिसका हम सदुपयोग करके कुछ अति महत्वपूर्ण कार्य कर सकते थेI इसलिए काम ज्यादा और वक्त कम की समस्या से निजात पाने के लिए आज हम एक प्रबंध तकनीक की चर्चा करेगे जो आपके दैनिक व व्यासायिक जीवन में बहुत ही लाभदायक साबित हो सकती हैI वाणिज्य का विद्यार्थी होने के नाते इस समस्या का वैज्ञानिक हल “समय प्रबंधन तकनीक” जो हमारे जीवन का एक हिस्सा है उस पर चर्चा करेंगे I इस समय प्रबंधन तकनीक का प्रयोग करने के लिए हम दो कदम उठाएंगे :
1.      कार्यो को सूचीबद्ध करना : जो कार्य हम करना चाहते है या जो जो काम हमे करने है उनको लिखना ताकि कोई काम छूटने का डर न रहे, ये काफी हद तक वेसी ही सूचि है जेसी हम बाज़ार से सामान लेन जाने से पूर्व बनाते है I ये सूचि बनने के बाद हमें पता होता है की आज हमें क्या क्या काम करना है और प्रत्येक काम हो जाने के बाद उस काम को काटते जाते है ताकि ये पता चल सके की कौन कौन से काम शेष राह गये है और दिन के अंत में रात्री को हम दिनभर किए कामों के आधार पर हमारा संतुष्टि स्तर निकलते हैI जितने अधिक काम पूर्ण उतना ही हमारा संतुष्टि स्तर अधिक होगा I इस सब में एक जरुरी बात ये भी है की हमें सिर्फ पुरे किए गए कामों की संख्या नहीं बढ़नी बल्कि ये ध्यान रखना भी जरूरी है की महत्वपूर्ण कार्य हुआ या नहीं ; कहीं हम गैर आवश्यक काम करते रहे और आवश्यक काम ना कर पाए तो हमारा संतुष्टि स्तर कम ही रहेगा I इस लिए सभी कार्यों को उसकी महता अनुसार क्रम देने हेतु  Stephen R Covey ने अपनी पुस्तक The Seven Habits ofHighly Effective People में Time Management Matrix का प्रयोग दिया I
2.      Time Management Matrix : निम्न चित्र से समझने का प्रयास करेंगे  

1.                   
Urgent and Important
2.                   
Important and Not Urgent
3.                   
Urgent and Not Important
4.                   
Not Urgent and Not Important
 इस उपरोक्त चित्र में चार वर्ग दिखाए गए है :
i.              प्रथम वर्ग : Urgent and Important यानि ऐसा अत्यंत आवश्यक और महत्वपूर्ण काम जो तुरंत व तत्काल करना होता है I
ii.             दूसरा वर्ग : Important Not Urgent यानि ऐसा काम जो महत्वपूर्ण तो है परन्तु अत्यंत आवश्यक नहीं है , जिसे करना जरूरी तो है परन्तु उसके लिए समय निश्चित करकर उसे पूरा किया जा सकता है I
iii.            तीसरा वर्ग : Urgent Not Important यानि ऐसा कार्य जो अत्यंत आवश्यक तो है परन्तु महत्वपूर्ण नहीं है जिसे हम किसी दुसरे को भी करने के लिए दे सकते है I
iv.           चौथा वर्ग : Not Important Not Urgent यानि ऐसा कार्य जो न तो अत्यंत आवश्यक है और न ही महत्वपूर्ण है, ऐसे कार्य को यदि कार्य की अधिकता हो तो हम टाल भी सकते है I

अब हमनें जो अपने कार्यो की सूचि बनाई है उन सभी कार्यों को इन चारो वर्गों में दिए प्रमाप अनुसार जो कार्य जिस वर्ग में सही बैठता हो उसमें लिखेगेI कौन सा कार्य किस वर्ग में आएगा यह व्यक्ति, समय , परिस्थिति अनुसार तय किया जाता है इसके लिए कोई वैज्ञानिक सूत्र नहीं है अत: व्यक्ति अपनी जरूरत व परिस्थिति अनुसार अपने कार्यो के लिए वर्ग तय कर लेता है I इसप्रकार जब ये तमाम कार्यवाही पूर्ण हो जाने के पश्चात व्यक्ति बिलकुल निश्चित हो जाता  है की कौन सा कार्य पहले करना है और कौन सा बाद में तथा इसी क्रम से हम अपना काम निबटाने लग जाते हैI कार्यों की प्राथमिकता तय हो जाने के बाद  अत्यंत आवश्यक और महत्वपूर्ण काम सबसे पहले किया जाता है I इस प्रकार दिन के अंत में यदि कोई काम न भी हो पाए तोभी हमें संतुष्टि रहती है की अत्यंत आवश्यक और महत्वपूर्ण काम तो पुरे कर लिए गए है और जो काम बकाया रह गए है वे कम आवश्यक व कम महत्व के रहे है I

ये प्रक्रिया या विधि हम थोड़े से प्रयास से अपने जीवन में अपना सकते है और समय काम व काम ज्यादा की अनावश्यक समस्या से छुटकारा पा सकते है, प्रारम्भ में हमें शायद इसमें थोड़ी परेशानी आये मगर कुछ ही समय बाद आपको ये रोचक लगेगी और आप आवश्यक कार्य के समय पर न होने के कारण होने वाले नुकसान व परेशानी से बच जाओगे तथा अपनी दिनचर्या का उचित प्रबंधन भी कर सकोगे I

Tuesday, 20 January 2015

पारिवारिक रिश्तों को सहेजने, संवारने, समेटने और जीने का नाम है संयुक्त परिवार


हमारे भारत देश में आज भी एक संयुक्त कुटुंब की परंपरा मौजूद है I भारत में सदियों से संयुक्त कुटुंब की प्रथा चली आ रही है I एक बाप की एक से ज्यादा संताने एक साथ मिलजुल कर रहती थी और  हर एक सुख दुःख में एक दुसरे के साथ कंधे से कन्धा मिला कर चलते थे और घर में बुजुर्गो की एक इज्जत होती थी I चाहे सब लोग दिनभर एक दुसरे से अलग रहे हो परन्तु  रात को एक साथ मिलकर खाना खाते और घर में चल रही हर बात पर चर्चा करते I घर के बुजुर्ग एवम पुरुष मिल कर हर जिम्मेदारी को बाँट लेते थे और अपनी जिम्मेदारी को पूरा करने में लग जाते थे I हर कार्य चाहे वह  छोटा हो या बड़ा जिम्मेदारी का बटवारा होने से वह जल्दी ख़त्म हो जाती था और उसका बोझ भी हल्का हो जाता था I घर का हर एक सदस्य अपने परिवार की ख़ुशी में खुश और दुःख में दुखी होता I संयुक्त कुटुंब से लोगो में एक दुसरे के प्रति आदर होता था और इससे एक स्वस्थ समाज का निर्माण होता था  I इसीलिए पुराने ज़माने में लोग कम आय में भी खुश थे एवम लम्बी आयु पाते थे I उस समय में वृधाश्रम भी कम थे या न के बराबर थे क्यूंकि लोगो की जरूरते कम होती  थी और जितना था उतने में संतोष मानते थे I आज के व्यवासीकरण में जो सबसे बड़ा बदलाव आया है वह है संयुक्त परिवार का टूटना ,समय का चक्र बदलता गया और लोगो की जरूरते बढती गयी I जरूरतों के साथ साथ महंगाई और प्रतिस्पर्धा भी बढती गयी I लोगो को अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए ज्यादा वक़्त अपने कार्यस्थल पर और व्यवसाय में लगाना पड़ा और घर से दूर भी रहना पड़ा और इसी तरह लोग अपने में ही व्यस्त रहने लग गए I इस तरह से संयुक्त परिवार की भावना ख़त्म होने लग गयी I आज की भाग दौड़ भरी जिंदगी में भाई भाई को और माँ बाप को भी एक बोझ मानने लग गए I आज भाई भाई के घर भी मेहमान बन कर जाने लगा है I शादी ब्याह जैसे मौके पर भी जहाँ पूरा घर और परिवार एक होकर काम करता था वही कार्य आज ठेकेदारी ने ले लिया है I भाई भाई से दूर हो रहा, माँ बाप की अहमियत भी घट रही है वृधाश्रमो की संख्या भी बढ़ने रही है I जिस माँ बाप ने हमें जन्म दिया और अपने सुख चैन की परवाह किये बिना हमें पढाया लिखाया और हमें एक काबिल इन्सान बनाया, आज वही माँ बाप हमें बोझ लगने लग गए है I जो भाई हमारे कंधे से कन्धा मिला कर चल सकता है वही भाई आज जमींन जायदाद व सम्पति में हिस्सेदार होने के चलते हमें हमारे दुश्मन जैसा लगने लगा है I मतलब आज चाचा, मामा, मौसी इन सभी रिश्तो की अहमियत कम होने लगी है I मानों ये सभी रिश्ते सिर्फ दिखावे के लिए है I आज अगर कोई अपने परिवार का या कोई रिश्तेदार हमारे घर आ जाये तो आने से पहले हम जाने की बात करने लग जाते  है I माँ बाप को भी हम मानों कोई वस्तु हो इस तरह समझ कर हम सब भाई भाई अपने घर रखने का समय निश्चित करते लेते है और उतने समय तक ही रखते है I मतलब हमारी जरूरते बढ़ने के साथ साथ हम हमारे परिवार और पारिवारिक मूल्यों को भी भूल चुके है I
संयुक्त परिवार के नाम पर हमें एक साथ दो या तीन या उससे भी ज्यादा पीढि़यों का प्यार और अपनापन मिलता था वहीं इसके बिखरने से अब हर जगह एकल परिवार के नाम पर रिश्ते बस स्वार्थ का पर्याय भर रह गये हैं। संयुक्त परिवार के नाम पर जब एक साथ सभी एक छत के नीचे निवास करते थे तो सबसे अनुकूल प्रभाव बच्चों पर पड़ता था। बात चाहे उनकी सुरक्षा की हो या संस्कारों की , सभी बच्चे एक छत के नीचे कभी दादी की कहानियों में तो कभी दादा जी के अनुभवों में समाहित होते थे। इस प्रकार हम कह सकते है कि सामाजिक संस्कार स्वत: अंतरित होते रहते थे। आज इस एकल परिवार की परिपाटी में संबंधों में जो बिखराव आया है उसकी मुख्य वजह हमारे आचार, व्यवहार, अपनी जरूरतों को ज्यादा महत्व एवं जीवन पद्धति में आने वाला बदलाव है। हालांकि कुछ लोग इसके टूटने को स्वाभाविक मानते हैं। आज के परिवेश की सबसे बड़ी खामी किसी का किसी भी स्तर पर समझौता न करना स्वतंत्र व स्वछन्द सोच और समर्पण का आभाव है । सबके साथ रहने और अपने लोगों को सुनने, गुनने और समझने के लिए संयुक्त परिवार की व्यवस्था ने इतने रिश्ते दिये हैं जो शायद दुनिया के नक्शे पर कहीं भी नहीं मिलते। रिश्तों को जीने की कला से आज की युवा पीढ़ी का पलायन सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है। निजी स्वतंत्रता के नाम पर बुजुर्गों का अपमान एवं सिर्फ और सिर्फ आर्थिक उन्नति को ही सर्वांगिण विकास समझना आज आधुनिकता की परिभाषा बन गई है। संयुक्त और एकल परिवार के फायदे नुकसान पर बहस की गुंजाइस भले हो, इसकी खामियों- खूबियों पर चर्चा कराने की संभावनायें भी हो सकती हैं, इस पर वाद-विवाद भी हो सकता, फिर भी संयुक्त रूप से परिवार में रहने का सीधा और स्पष्ट फायदा तो यह दिखता ही है कि हम जिन लोगों के बीच रहने की बात करते वो हमारे अपने हैं। कहते हैं कि खून कितना भी पतला हो जाये कभी पानी नहीं बन सकता यानि हमेशा पानी से गाढ़ा ही रहता है। सिर्फ इसकी जरूरतें और पारिवारिक जनों के महत्व को समझने की आवश्यकता है। पारिवारिक रिश्तों को सहेजने, समेटने और उन्हें जीने का नाम है संयुक्त परिवार
बहरहाल संयुक्त परिवार की मजबूत व्यवस्था कभी हमारी पहचान होती थी, पर आज भारतीय समाज भी छोटे-छोटे एकल परिवारों का समाज बनता जा रहा है। इस परिवर्तन के लिए जिम्मेवार दूसरी वजह भले अस्पष्ट हो पर स्वतंत्र निर्णय लेने,  धन संपदा की अत्यधिक चाहत, और परंपरागत मूल्यों-मान्यताओं से दूर होने का दूसरा नाम एकल परिवारहै।
 आज अकेले रहना अपने आप में एक अलग पहचान या एक स्टेट्स माना जाता है I महानगरो में से तो संयुक्त कुटुंब की प्रथा कबसे खत्म हो चुकी है I गलती हमारी भी नहीं है, आज महंगाई और प्रतिस्पर्धा ही इतनी है की हम अपनी नौकरी या व्यवसाय की वजह से एक दिन के लिए भी कहीं दूर नहीं राह सकते क्योंको आज निजीकरण और प्रतिस्पर्धा के युग में न जाने कब अपने रोजगार से हाथ धोना पड़ जाये I ऊपर से आज कल की शिक्षा और बच्चो की परवरिश भी इतनी मुश्किल व महंगी हो गई है की हम एक कमाते है तो वहां तीन खर्च होते है I ऐसे में अगर घर पर कोई भी खाली व बेकार निठल्ला बैठा रहे तो वो अखरता है I आज समय ही ऐसा है I
लेकिन हमे समय की दुहाई दे कर हमारे परिवार और उसके प्रति अपनी जिम्मेदारियो को नहीं भूलना चाहिए I आज कल अकेले रहते हुए कई लोग अवसाद ग्रस्त होकर ख़ुदकुशी और आत्महत्या करने लगे है और ज्यादातर लोग दिल, रक्तचाप, मधुमेह व  मानसिक बीमारी ग्रस्त रहने लगे है I जो संयुक्त कुटुंब की भावना लोगो के सुख का कारण थी आज उसके न रहने से उसके दुष्परिणाम भी हमारे सामने आ  रहे है I
हम समय की दुहाई देकर देकर हमारे परिवार के प्रति जिम्मेदारी नहीं भुला सकते I चलो हर समय हमारा  साथ रहना मुमकिन नहीं लेकिन त्योहारों पर, खास मोकों पर तो हम एक साथ मिल ही सकते है, हर प्रसंग पर  हम एक दुसरे के साथ खड़े रह सकते है और एक दुसरे के सुख दुःख में हिस्सेदारी कर सकते है I हमारा देश अपनी संस्कृति और उसकी पारिवारिक रचना के लिए जाना जाता है I आओ हम इसे बनाये रखे और हम हमारे परिवार और सदस्यों के प्रति वफादार रहे I अगर हमारा परिवार स्वस्थ होगा तो एक आदर्श समाज का निर्माण होगा और अगर समाज में आदर्शता होगी तो देश भी आगे बढेगा  क्यूंकि देश की प्रगति में समाज भी एक महत्वपूर्ण अंग है I अत: बस एक ही विनती है आप चाहे कोई रिश्ते को माने या न माने परन्तु माँ बाप दिल नत दुखाना और उन्हें किसी भी कीमत पर अपने से मत दूर करना I वे ही है जो हमे इस दुनिया में लाये और हमे काबिल बनाया I



Monday, 19 January 2015

भारतीय स्टेट बैंक ने बैंकिंग को और सरल बनाते हुए अपने ग्राहकों के लिए मिस कॉल पर बैलेंस जानने की सुविधा शुरू की है।

भारतीय स्टेट बैंक ने बैंकिंग को और सरल बनाते हुए अपने ग्राहकों के लिए मिस कॉल पर बैलेंस जानने की सुविधा शुरू की है।
बैंक की अध्यक्ष अरुंधति भट्टाचार्य ने आज यहां (एसबीआई क्विक) नामक इस सुविधा की शुरुआत की। इसके तहत बैलेंस जानने के लिए या पिछले पांच लेनदेन की जानकारी की सुविधा मिस कॉल और एसएमएस के जरिए दी गई है। जबकि कार्ड लॉक करने, होम लोन, कार लोन और एसबीआई क्विक के बारे में जानकारी पाने के लिए एसएमएस भेजना होगा।
एसबीआई क्विक के इस्तेमाल से पहले बैंक खाते के साथ दिए गए अपने मोबाइल नंबर से एक एसएमएस भेजकर उस नंबर को इस सुविधा के लिए पंजीकृत करना होगा। पंजीकरण के लिए आरईजी लिखकर एक स्पेस देकर अपना एकाउंट नंबर 9223488888 पर भेजना होगा। पंजीकरण की पुष्टि वाला एसएमएस तुरंत उपभोक्ता के नंबर पर आ जाएगा।
बैलेंस जानने के लिए बीएएल लिखकर 9223866666 पर एसएमएस भेजा जा सकता है या मिस कॉल दी जा सकती है। पिछले पांच लेनदेन की जानकारी के लिए 9223866666 पर एमएसटीएमटी लिखकर एसएमएस भेजा जा सकता है या मिस कॉल दी जा सकती है। 
बैंक ने बताया कि कार्ड लॉक कराने के लिए अंग्रेजी के बड़े अक्षरों में लॉक लिखकर स्पेस देकर कार्ड नंबर के अंतिम चार अंक 567676 पर एसएमएस करना होगा। वहीं होम लोन, कार लोन और एसबीआई क्विक के लिए अंग्रेजी के कैपिटल लेटर में क्रमश: होम, कार या हेल्प लिखकर 9223588888 पर एसएमएस करना होगा। इसके बाद उन्हें एसएमएस से जानकारी दी जाएगी और संबंधित विभाग की टीम फोन पर कॉल भी करेगी।

संयुक्त परिवार समृद्ध संस्कृति का आधार

संयुक्त परिवार समृद्ध संस्कृति का आधार
संयुक्त परिवार में रहने का एक अलग ही आनंद है। एकाकी जीवन भी भला कोई जीवन है ? जब तक परिवार संयुक्त रहता है, परिवार का हर सदस्य एक अनुशासन में रहता है। उसको कोई भी गलत कार्य करने के पहले बहुत सोचना समझना पड़ता है, क्योंकि उस पर परिवार की मर्यादा का अंकुश रहता है। यह अंकुश हटने के बाद वह बगैर लगाम के घोड़े की तरह हो जाता है। लेकिन संयुक्त परिवार में अगर सुखी रहना है तो लेनेकी प्रवृत्ति का परित्याग कर देनेकी प्रवृत्ति रखना पड़ेगी। परिवार के हर सदस्य का नैतिक कर्त्तव्य है कि  वे एक दूसरे की भावानओं का आदर कर आपस में तालमेल रख कर चलें। ऐसा कोई कार्य न करें जिससे कि दूसरे की भावनाओं को ठेस पहुँचे। किसी भी विषय को कृपया अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनायें।  गम खाकर और त्याग करके ही संयुक्त परिवार चलाया जा सकता है। इसमें भी सबसे अहम भूमिका परिवार प्रधान की होती है। हमें शंकर भगवान के परिवार से शिक्षा लेनी चाहिये। उनके परिवार के सदस्य हैं शंकर भगवान राख़ का लेप, गले में मुंड मालाऔर बाघम्बर लपेटे रखने वाले ,पत्नी उमा (पार्वती) श्रृंगार व रूपमती ,हाथी के मुख युक्त पुत्र गणेश और टेढ़े शरीर वाले कार्तिकेय । सदस्य के वाहन हैं नन्दी (बैल), सिंह, चूहा और मयूर (मोर)। शंकर भगवान के गले में सर्पों की माला रहती है। इनके जितने वाहन हैं सब एक दूसरे के जन्मजात शत्रु हैं, फ़िर भी शंकर भगवान परिवार के मुखिया की हैसियत से विपरीत स्वभाव व भिन्नता के बावजूद उनको एकता के सूत्र में बाँधे रहते हैं। विभिन्न प्रवृत्तियों वाले भी एक साथ प्रेम से रहते हैं। इसी तरह संयुक्त परिवार में भी विभिन्न स्वाभाव के सदस्यों का होना स्वाभाविक है, लेकिन उनमें सामंजस्य एवं एकता बनाये रखने में परिवार प्रमुख को मुख्य भूमिका निभानी पड़ती है। उसको भगवान की तरह समदर्शी होना पड़ता है।
   विभिन्नता में एकता रखना ही तो हमारा भारतीय आदर्श रहा है।शंकर भगवान के परिवार के वाहन ऐसे जीव हैं, जिनमें सोचने समझने की क्षमता नहीं है। इसके उपरांत भी वे एक साथ प्रेमपूर्वक रहते हैं। फ़िर भला हम मनुष्य योनि में पैदा होकर भी एक साथ प्रेमपूर्वक क्यों नहीं रह सकते ? आज छोटा भाई बड़े भाई से राम बनने की अपेक्षा करता है, किन्तु स्वयं भरत बनने को तैयार नहीं। इसी तरह बड़ा भाई छोटे भाई से अपेक्षा करता है कि वह भरत बने लेकिन स्वयं राम बनने को तैयार नहीं। सास बहू से अपेक्षा करती है कि वह उसको माँ समझे, लेकिन स्वयं बहू को बेटी मानने को तैयार नहीं। बहू चाहती है कि सास मुझको बेटी की तरह माने, लेकिन स्वयं सास को माँ जैसा आदर नहीं देती। पति पत्नि से अपेक्षा करता है कि वह सीता या सावित्री बने पर स्वयं राम बनने को तैयार नहीं। यह परस्पर विरोधाभास ही समस्त परिवार कलह का मूल कारण होता है। थोड़ी सी स्वार्थ भावना का त्याग कर एक दूसरे की भावनाओं का आदर करने मात्र से ही बहुत से संयुक्त परिवार टूटने से बच सकते हैं।
संयुक्त परिवार यानि मिला-जुला परिवार। जुड़ा हुआ परिवार। वह परिवार जिसमें कई रिश्ते-नाते एक छत के नीचे पलते-बढ़ते हैं। वे सभी एक साथ मिलकर रहते हैं। एक ही रसोई का खाना खाते हैं। वह परिवार जो अकेला न होकर कई छोटे-छोटे परिवारों से मिलकर रोजमर्रा के काम में जुटा रहता है, संयुक्त परिवार कहलाता है। बड़े-बुजर्गों  के साथ कई रिश्तों का एक माला में पिरोया हुआ परिवार ही संयुक्त परिवार कहलाता है। इस परिवार में एक मुखिया होता है, जो सभी की आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए कामों का बंटवारा करता है। संयुक्त परिवार की खास बात यह होती है कि यहाँ खून के रिश्ते को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है। बूढ़ों को खास तवज्जो दी जाती है और बूढ़े अपने अनुभव के आधार पर घर-परिवार के बच्चों को संस्कार-परक शिक्षा-दीक्षा देते हैं। बच्चों को अच्छी-बुरी आदत का भान कराते हैं।   मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह अकेला नहीं रह सकता। यही कारण है कि उसे साथ रहने और समूह में रहने की आदत है। ऐसे समूह के साथ जिनके आपसी हित और संबंध जुड़े हों। वह परिवार के रूप में स्थापित हो गए। आगे चलकर परिवार, संपत्ति, सुरक्षा-देखभाल और खेती-बाड़ी ने रिश्तों-नातों को जन्म दिया। फिर रक्त संबंधी रिश्तों को खास समझा गया।  दादा-दादी, ताऊ-तायी, चाचा-चाची, देवर-भाभी, देवरानी-जेठानी, जेठ-ननद, भतीजा-भतीजी, पोता-पोती आदि रिश्तों को संयुक्त परिवार का हिस्सा माना गया। ये रिश्ते समाज के साथ-साथ बनते-बिगड़ते रहे। पहले खेती प्रधान समाज था। हर परिवार में ज्यादा से ज्यादा लोगों की जरूरत पड़ती थी। यही कारण था कि एक ही चूल्हा हुआ करता था। सब लोग एक ही रसोई का पका हुआ भोजन खाते और मिलकर खेती करते थे।

सेहत-चिकित्सा का विकास नहीं हुआ था। मृत्यु दर अधिक थी। यही कारण था कि परिवार को बड़ा रखने की सोच ज्यादा प्रबल थी।  समाज के साथ-साथ मानव की सोच में बदलाव आया। जन्म दर बढ़ी और स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएँ मिलने से मृत्यु दर कम हुई और रोजगार के साधन बढे, रोजी-रोटी व नोकरी के लिये घर बाहर निकलना पड़ा । जिस कारण लोगो की सोच बदली और एकल परिवार की सोच बढ़ी। संयुक्त परिवार बिखरने लगे। माता-पिता और उनके बच्चे ही एकल परिवार का हिस्सा माने गये। लंबे समय तक संयुक्त परिवार आदर्श परिवार माने गये। फिर एकल परिवार को अच्छा माना जाने लगा परन्तु आज फिर से संयुक्त परिवार की धारणा समाज में अच्छी माने जाने लगी है। बच्चों की सही देख-रेखपरवरिश ठीक से न हो पाना, बच्चों में संस्कार और मानवीय मूल्यों की कमी संयुक्त परिवार के न होने से है।   बच्चे समूह में ज़्यादा सीखते हैं। अपने संगी-साथियों से ज्यादा अपने घर में हम उम्र और बड़े बच्चों से बच्चे ज्यादा सीखते हैं। प्रेम, अपनापन, सहयोग, सहायता, साझेदारी और सामूहिकता तो संयुक्त परिवार का प्राण है। यही कारण है कि संयुक्त परिवार में पले बढे बच्चे  ज्यादा सामाजिक ,मानवीय, विनम्र और सहयोगी होते हैं। जबकि अकेले और एकाकी परिवार के बच्चे हिंसक, झगड़ालू और कुंठित हो जाते हैं। आज के बच्चे कल का भविष्य हैं। आदर्श नागरिक बन कर वे देश के संचालक होंगे। यदि बच्चों को अच्छी परवरिश और संस्कार नहीं मिलेंगे तो वे आगे चलकर न ही अपना विकास कर पायेंगे और न ही परिवार का और न ही वे देश के विकास में सकारात्मक सहयोग दे सकेंगे ।  आज फिर से संयुक्त परिवार की भावना को स्वीकार किया जा रहा है। हर कोई चाहता है कि उनका परिवार सुखी और खुशहाल हो। कहा भी गया है कि मानव न तो देवता है न ही दानव। मानवता भी यही कहती है कि अपने लिए न जीकर हम सबके लिए जियें। मिलकर रहने में जो सुख है वे अकेले रहने में कभी हो ही नहीं सकती।

Sunday, 18 January 2015

चरण स्पर्श के वैज्ञानिक फायदे

चरण स्पर्श के वैज्ञानिक फायदे
चरण-स्पर्श, दंडवत प्रणाम, चरणरज धारण या फिर चरणामृत-पाने से जीव व वस्तु में होने वाले परिवर्तन के पीछे एक उच्च स्तरीय शक्ति का प्रभाव का होना है। इसे हमारे ऋषि-मुनियों ने अन्वेषण के पश्चात स्मृतियों में उद्धृत किया है। क्षितिज, जल, पावक, गगन, समीरा। पंच तत्व यह अधम शरीरा॥ आधुनिक विज्ञान यह निर्विवाद रूप से स्वीकार करता है कि मानव शरीर पंच तत्वों से निर्मित है जो सजातीय तत्वों को अपनी ओर आकर्षित करता रहता है। मित्रता, स्नेह , ममता व प्रेम इसी आकर्षण की उपज है। यह आकर्षण या खिंचाव एक चुम्बकीय गुण है। प्रत्येक जीवधारी में एक ही समय में तीन वैज्ञानिक सिध्दांत एक साथ कार्य करते रहते हैं :
(क) चुम्बकीय शक्ति (ख) तात्विक गुण (ग) वुद्युतीय उर्जा ; हम अगर चिन्तन मनन करे तो पाते है की प्रतिदिन हम अनेक लोगों से मिलते है , उनमें से कुछ को हम याद नहीं रखते और कुछ के साथ हमारा मित्रता का भाव प्रकट हो जाता है और उनसे ये लगाव,मित्रता या खिंचाव उस व्यक्ति विशेष में समाहित चुम्बकीय गुण के कारण होता है जो सजातीय गुण वाले व्यक्ति को अपनी और आकर्षित करता है I

शास्त्रों में कहा गया है कि बड़ों के चरण स्पर्श करके उनसे आशीर्वाद लेना चाहिए। विशेष तौर पर जब आप किसी जरूरी काम से कहीं जा रहे हों या कोई नया काम शुरू कर रहे हों। इससे सफलता की संभावना बढ़ जाती है। दरअसल इसके पीछे अध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक कारण छुपा है। इस परंपरा के पीछे कई कारण मौजूद हैं। शास्त्रों के अनुसार ऐसा माना जाता है कि बड़े लोगों के पैर छुने से हमारे पुण्य में बढ़ोतरी  के साथ साथ बल, बुधि,विद्या ,यश और आयु की स्वत: वृद्धि होती है। साथ ही उनके आशीर्वाद स्वरूप हमारा दुर्भाग्य दूर होता है और मन को शांति मिलती है एवं विनम्रता का भाव जागृत होता है। आपके शरीर की उर्जा चरण स्पर्श करने वाले व्यक्ति में पहुंचती है। श्रेष्ठ व्यक्ति में पहुंचकर उर्जा में मौजूद नकारात्मक तत्व नष्ट हो जाता है। सकारात्मक उर्जा चरण स्पर्श करने वाले व्यक्ति से आशीर्वाद के माध्यम से वापस मिल जाती है। इससे जिन उद्देश्यों को मन में रखकर आप बड़ों को प्रणाम करते हैं उस लक्ष्य को पाने का बल मिलता है।
पैर छुना या प्रणाम करना, केवल एक परंपरा या बंधन नहीं है। यह एक विज्ञान है जो हमारे शारीरिक, मानसिक और वैचारिक विकास से जुड़ा है। पैर छुने से केवल बड़ों का आशीर्वाद ही नहीं मिलता बल्कि अनजाने ही कई बातें हमारे अंदर उतर जाती है। पैर छुने का सबसे बड़ा फायदा शारीरिक कसरत होती है, तीन तरह से पैर छुए जाते हैं। पहले झुककर पैर छुना, दूसरा घुटने के बल बैठकर तथा तीसरा साष्टांग प्रणाम। झुककर पैर छुने से कमर और रीढ़ की हड्डी को आराम मिलता है। दूसरी विधि में हमारे सारे जोड़ों को मोड़ा जाता है, जिससे उनमें होने वाले स्ट्रेस से राहत मिलती है, तीसरी विधि में सारे जोड़ थोड़ी देर के लिए तन जाते हैं, इससे भी स्ट्रेस दूर होता है। इसके अलावा झुकने से सिर में रक्त प्रवाह बढ़ता है, जो स्वास्थ्य और आंखों के लिए लाभप्रद होता है। प्रणाम करने का तीसरा सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे हमारा अहंकार कम होता है। किसी के पैर छुना यानी उसके प्रति समर्पण भाव जगाना, जब मन में समर्पण का भाव आता है तो अहंकार स्वत: ही खत्म होता है। इसलिए बड़ों को प्रणाम करने की परंपरा को नियम और संस्कार का रूप दे दिया गया।
अत: प्रत्येक रोज़ प्रातकाल में और किसी भी कार्य की शुरुआत से पहले हमें अपने घर के बड़े बुजर्गों के ,माता पिता के चरण स्पर्श अवश्य करने चाहिए ,इससे हमारे कार्य में सफलता की सम्भावना बढ़ जाती है , हमारा मनोबल बढ़ता है और सकारात्मक उर्जा मिलती है नकारात्मक शक्ति घटती है I  

Saturday, 17 January 2015

जमीन पर बैठ कर खाना खाने के अदभुत फायदे

हमारे  भारतीय घरों में लोग जमीन पर बैठ कर भोजन करते हैं। हम में से ज्यादातर लोगों ने खाना खाने की जगह के रुप में मेज और कुर्सी को शामिल  किया है जबकि हम में से कुछ ऐसे हैं जो टीवी के सामने बैठ कर या बिस्तर पर बैठ कर खाना पसंद करते हैं। भले ही, यह आपके लिए बहुत आरामदायक हो, लेकिन यह आपके स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है।
हमारे पूर्वजों ने निश्चित रूप से बहुत सोच कर जमीन पर बैठ कर, पालथी मार कर भोजन करने की प्रथा को सुनिश्चित किया होगा। यहां आपके स्वास्थ्य के लिए उपयोगी 10 प्राचीन कारण दिए गए हैं।
1 यह हमारी पाचनक्रिया को सुधारता है: 
आमतौर पर जब आप जमीन पर बैठते हैं तो पालथी मार कर बैठते हैं - इसे सुखासन या पद्मासन करते हैं जोकि पाचन में मदद करने वाली मुद्रा हैं (हालांकि यह माना जाता है कि जब आप भोजन करने के लिए इस मुद्रा में बैठते हैं तो यह स्वतः आपके दिमाग को पाचनक्रिया के लिए तैयार होने के संकेत भेजती है)। इसके अलावा जब आप जमीन पर बैठ कर खाना खाते हैं, तो आप स्वाभाविक रूप से खाने के लिए थोड़ा आगे झुकते हैं और खाने को निगलने के लिए वापस अपनी शुरुआती स्थिति में चले जाते हैं। इस तरह लगातार आगे और पीछे की ओर झुकने से आपकी पेट की मांसपेशियां सक्रिय होती है साथ ही यह आपके पेट में एसिड़ के स्राव को भी बढाता है - इस तरह आपके लिए भोजन को पचाना बहुत आसान हो जाता है।
2 वजन को नियंत्रित  करता है: 
जब आप इस मुद्रा में बैठते हैं, तो आपका दिमाग अपने आप शांत हो जाता है और भोजन पर बेहतर तरीके से ध्यान केंद्रित कर पाता है। इसके अलावा यह मुद्रा आप द्वारा खाए गए कुल भोजन से जोड़ती है और आपको जल्दी ही तृप्त महसूस कराती है। हालांकि मेज पर बैठ कर खाने की तुलना में आपकी जमीन पर बैठ कर खाने की गति धीमी होगी, तथा यह आपके पेट एवं आपके दिमाग को तृप्तता के एहसास के संकेतों से जुड़ने का समय देता है, इस प्रकार से आपको अधिक खाने से रोकता है।
3 आपको और लचीला बनाता है:
जब आप पद्मासन में बैठते हैं, तो आपकी श्रोणि, निचली पीठ, पेट के आसपास एवं ऊपरी तथा निचले पेट की मांसपेशियों में खींचाव महसूस होता है - जो दर्द और पीड़ा को कम करते हैं। फल स्वरुप आपके पाचन तंत्र को आरामदायक एवं सामान्य स्थिति में रहने में मदद करता है। इसके अलावा, यह स्थिति किसी भी प्रकार से आपके पेट को संपीड़ित नहीं करती जिससे आपको खाने में तथा बेहतर रीति से पचाने में मदद मिलती है।
4 आपका ध्यान खाने में रहता  है :
जब आप परिवार के साथ जमीन पर बैठ कर खाना खाते हैं तो आपका ध्यान खाने में रहता है। यह केवल आपके ध्यान को ही खाने पर केंद्रित नहीं करता बल्कि खाना खाते समय बेहतर विकल्प को चुननें में भी मदद करता है। क्योंकि इस मुद्रा में आपका मन बहुत शांत और आपका शरीर पोषण को स्वीकारने के लिए तैयार होता है, जमीन पर बैठ कर भोजन करने की प्रथा सही मात्रा में खाना खाने के लिए एवं सही प्रकार का भोजन करने के लिए सबसे अच्छी है।
5 आपको आपके परिवार के साथ एकजुट रखता है: 
आमतौर पर जमीन पर बैठे कर खाना खाने की प्रथा एक परिवारिक गतिविधि है। यह समय अपने परिवार के साथ जुड़ने के लिए बहुत अच्छा है। क्योंकि जमीन पर बैठ कर भोजन करने से आपका मन शांत और सुखद रहता है, अतः यह अपने परिवार के साथ जुड़ने का एक बेहतरीन कारण बन जाता है - तथा आपको ध्यान से एवं शांति से सुनने में मदद करता है।
6 आपके आसन को सुधारता है:
जब आप खाने के लिए जमीन पर बैठते हैं तो आप स्वाचालित रुप से सही मुद्रा में बैठते हैं, अपनी पीठ तथा रीढ़ की हड्डी को सीधा रखते हुए और अपने कंधों को पीछे धक्कलते हुए - आप गलत मुद्रा में बैठने से होने वाले सारे दर्दों से निजात पाते हैं।
7 आपकी आयु को बढ़ा सकता है: 
प्रिवेंटिव कार्डियोलॉजी की पत्रिका यूरोपीयन जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया है कि जो लोग जमीन पर पद्मासन में बैठते है और बिना किसी सहारे के खड़े होने में सक्षम है, उनकी लंबे समय तक जीवित रहने की संभावना अधिक है। क्योंकि इस मुद्रा से उठने के लिए अधिक लचीलेपन तथा शारीरिक शक्ति की आवश्यकता होती है। इस अध्ययन से यह भी पता चला है कि जो लोग बिना किसी सहारे के उठने में असक्षम थे उनकी अगले 6 सालों में मरने की संभावना 6.5 गुना अधिक थी।
8 घुटने एवं कमर के जोड़ों को लचीला बनाता है:
पद्मासन एवं सुखासन एक ऐसी मुद्रा है जो आपके पूरे शरीर को लाभ पहुंचाती है। ये केवल आपके पाचन तंत्र को बेहतर बनाने में ही मदद नहीं करते बल्कि आपके जोड़ों को कोमल तथा लचीले बनाए रखने में भी मदद करते हैं और आपको चोट ग्रस्त एवं गठिया या हड्डियों की कमजोरी जैसे अपक्षयी रोगों से भी बचाते हैं। घुटने, टखने और कमर के जोड़ों को लगातार झुकाने के कारण यह उन्हें लचीला और रोगों से मुक्त रहने में मदद करता है। लचीलेपन के साथ जोड़ों में चिकनाई आती है जिससे जमीन पर बैठने में आसानी होती है।
9 दिमाग को आराम तथा तंत्रिकाओं को शांत करता है:
 एक बहुत ही उपयोगी उपकरण के रुप में, युर्वेद में यह  माना जाता है कि मन को शांत रखकर खाना खाने से पाचन बेहतर होता है और कुछ मामलों में तो लोगों को स्वाद से भोजन खाने में भी मदद करता है
10 परिसंचरण को सुधारते हुए दिल को मजबूत बनाता है:
जब आप जमीन पर बैठ कर खाना खाते हैं तो आपके दिल को रक्त संचलन का लाभ प्राप्त होता है और इस तरह दिल बड़ी आसानी से पाचन में मदद करने वाले सभी अंगों तक खून पहुंचाता है। लेकिन जब आप कुर्सी पर बैठ कर खाना खाते हैं तो यहां रक्त संचलन का स्वरुप विपरीत है, इसमें प्रचलन पैरों तक होता है जोकि दिल की तुलना में काफी नीचे है। इसलिए जमीन पर बैठ कर खाना खाने से आपको मजबूत मांसपेशियों के साथ एक स्वस्थ दिल मिलता है जो आपकी दैनिक जीवन की परेशानियों से निपटने में आपकी मदद करता है।